बंगाल में ममता का किला ढहा: क्या सिर्फ हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण था जीत की वजह?
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। 15 साल के लंबे शासन के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सत्ता से बाहर हो गई है। भाजपा ने राज्य की 294 सीटों में से 207 पर कब्जा जमाकर प्रचंड जीत दर्ज की है, जबकि टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट गई है।

जीत का असली सूत्र: भय का अंत और संगठनात्मक शक्ति प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक और एक्सिस माय इंडिया के प्रमुख प्रदीप गुप्ता ने इस जीत के पीछे के कारणों का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि बंगाल में टीएमसी के वर्षों के कुशासन और भय के माहौल से जनता परेशान थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व, अमित शाह की रणनीति और आरएसएस की जमीनी संगठनात्मक मजबूती ने भाजपा के लिए जीत का मार्ग प्रशस्त किया।

हिंदू-मुस्लिम वोट बैंक का सच गुप्ता ने इस धारणा को सिरे से खारिज किया कि बंगाल की जीत सिर्फ हिंदू वोटों के एकीकरण का परिणाम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बार मुस्लिम मतदाताओं का भी एक वर्ग टीएमसी से दूर हुआ। उन्होंने कहा, चुनाव जीतना या हारना केवल हिंदू-मुस्लिम मुद्दों पर आधारित नहीं होता। मतदाता अब प्रदर्शन को महत्व देते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हुमायूं कबीर की पार्टी और वाम दलों को भी सीटें मिली हैं, जो साबित करता है कि समीकरण बदल रहे हैं।

मुफ्त योजनाओं पर नया नजरिया राजनीति में फ्रीबीज (मुफ्त की रेवड़ी) की बहस पर प्रदीप गुप्ता ने एक अलग राय रखी है। उनका मानना है कि सरकार का मुख्य काम जनता से टैक्स वसूलना और उसे कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करना है। यदि सरकार सीधे नकद लाभ देती है, तो इससे लीकेज कम होता है और वितरण तेज होता है। उन्होंने कहा कि भारतीय मतदाता बेहद परिपक्व और समझदार हैं; वे जानते हैं कि अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर किसे चुनना है।

यूपी और पंजाब का भविष्य अन्य राज्यों के संदर्भ में, गुप्ता ने बताया कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के कामकाज से जनता काफी हद तक संतुष्ट है, जिससे भाजपा वहां मजबूत स्थिति में है। वहीं, पंजाब में चार-कोणीय मुकाबले के चलते आम आदमी पार्टी के प्रति जनता का रुख मिला-जुला है।

सर्वेक्षकों पर दबाव और निष्पक्षता चुनाव विश्लेषण के जोखिमों पर बात करते हुए गुप्ता ने साझा किया कि बंगाल में उनके सर्वेक्षकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि 2017 में भी उनके लोगों को जेल भेजा गया था और इस बार भी चुनाव के दौरान 6 सर्वेक्षकों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, उनका मानना है कि मतदाताओं का मन पढ़ना एक जटिल लेकिन महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

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