दुनिया तेजी से बदल रही है और उसके साथ भारत भी। आज का भारत सिर्फ अपनी विशाल आबादी के लिए नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी, स्पेस, डिजिटल इकोनॉमी और ग्लोबल कूटनीति के दम पर दुनिया की सबसे ताकतवर आवाजों में शुमार हो चुका है। भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में अपना लोहा मनवा रही हैं, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज टेक कंपनियों का नेतृत्व भारतीय मूल के सीईओ कर रहे हैं और ISRO अंतरिक्ष में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।
लेकिन इस विकास गाथा के बीच, पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग आज भी भारत को उसी पुराने चश्मे से देख रहा है। यह चश्मा सपेरों , जादू-टोने और पिछड़ेपन का है। नॉर्वे के एक अखबार द्वारा पीएम मोदी को सपेरे के रूप में दिखाए जाने के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि आखिर पश्चिमी जगत भारत की तरक्की को स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहा है?
नॉर्वे के प्रमुख अखबार आफ़्टेनपोस्टेन ने एक कार्टून प्रकाशित किया, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी को सपेरे के रूप में दिखाया गया। इस कलाकृति में सांप की जगह पेट्रोल पाइप को दर्शाया गया था। इस कार्टून का उद्देश्य राजनीतिक कटाक्ष हो सकता था, लेकिन भारतीयों ने इसे एक नस्लवादी और औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक माना। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल समेत कई दिग्गजों ने इसे भारत का अपमान बताया और स्पष्ट किया कि यह कार्टून भारत की वास्तविकता के बजाय पश्चिमी देशों के गहरे पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
सवाल यह है कि जो भारत आज डिजिटल पेमेंट (UPI) का वैश्विक लीडर है, जो चंद्रयान और आदित्य मिशन के जरिए अंतरिक्ष विज्ञान में दुनिया को चौंका रहा है, उसे पश्चिमी मीडिया पिछड़ा क्यों दिखाता है?
आईटी सेक्टर में भारत दुनिया की रीढ़ बन चुका है। मेड इन इंडिया अब महज एक नारा नहीं, बल्कि वैश्विक हकीकत बन चुका है। बावजूद इसके, जब भी भारत अपनी धाक जमाता है, पश्चिमी मीडिया के कुछ हिस्से उसे पुराने स्टीरियोटाइप्स (सपेरे, गरीबी, भीड़भाड़) में लपेटकर पेश करने की कोशिश करते हैं।
भारत को लेकर ऐसे अपमानजनक चित्रण कोई नई बात नहीं हैं। 2024 में बाल्टीमोर ब्रिज हादसे के दौरान एक अमेरिकी वेब कॉमिक में भारतीय क्रू मेंबर्स को आपत्तिजनक तरीके से दिखाया गया था। इसके अलावा, जर्मन मैगजीन डेर स्पीगल ने भारतीयों को अव्यवस्था से जोड़कर दिखाया था, तो 2014 में न्यूयॉर्क टाइम्स को भारत के स्पेस मिशन पर विवादित कार्टून छापने के बाद माफी मांगनी पड़ी थी।
इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक युग में भारत को अंधविश्वासी और गरीब देश के रूप में चित्रित किया जाता था ताकि औपनिवेशिक शासन को सही ठहराया जा सके। विशेषज्ञ मानते हैं कि आज भी उसी दौर की रूढ़िवादी छवियां पश्चिमी मीडिया की सोच का हिस्सा बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
आज का भारत एआई (AI), सेमीकंडक्टर, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप इकोसिस्टम की बात करता है। हमारी युवा शक्ति दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। जब कोई मीडिया संस्थान भारत को सपेरों का देश दिखाता है, तो यह महज एक व्यंग्य नहीं, बल्कि उस संकुचित मानसिकता का प्रदर्शन होता है जो बदलते हुए विश्व के ध्रुवों को स्वीकार करने में अक्षम है।
भारत की बढ़ती साख ने दुनिया को बदलने पर मजबूर तो किया है, लेकिन पश्चिमी मीडिया की इस मानसिकता को बदलने में अभी और समय लगेगा।
🇳🇴🇮🇳 : A major Norwegian newspaper published a cartoon showing PM Modi as a snake charmer during his visit to Oslo.
— War Flash (@WarFlash_2630) May 19, 2026
The headline described him as “a clever and slightly annoying man.” pic.twitter.com/FK0p851yuo
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