नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान एक नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लैंग द्वारा प्रोटोकॉल तोड़कर पूछे गए सवालों ने भारत में एक नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को क्रांति बताकर शेयर करने वाले कुछ नेताओं और पत्रकारों के लिए यह एक बड़ा मौका बन गया है। लेकिन क्या यह वास्तव में पत्रकारिता है या भारत को बदनाम करने की एक सोची-समझी साजिश?
क्या था पूरा वाकया? नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे के साथ संयुक्त बयान (Joint Statement) के बाद जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी बाहर निकले, हेले लैंग ने प्रेस फ्रीडम को लेकर सवाल दागना शुरू कर दिया। गौर करने वाली बात यह है कि यह कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं थी, बल्कि एक औपचारिक संयुक्त बयान का सत्र था, जहाँ सवाल-जवाब का कोई प्रावधान ही नहीं था। फिर भी, हेले लैंग ने न केवल प्रोटोकॉल तोड़ा, बल्कि सुरक्षा घेरे तक उनका पीछा किया।
एजेंडा या पत्रकारिता? हेले लैंग का सोशल मीडिया रिकॉर्ड एक अलग ही कहानी बयां करता है। पत्रकारिता के नाम पर सक्रिय होने का दावा करने वाली लैंग अपने एक्स (X) हैंडल पर पिछले दो सालों से लगभग निष्क्रिय थीं। अचानक, प्रधानमंत्री मोदी के दौरे पर उनका इतनी एक्टिव हो जाना कई सवाल खड़े करता है। जिस महिला ने पहले कभी किसी अन्य बड़े नेता से सवाल पूछने का वीडियो साझा नहीं किया, उसने पीएम मोदी के मामले में इसे न केवल पोस्ट किया, बल्कि इसे अपने फॉलोअर्स बढ़ाने का जरिया भी बना लिया।
प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का सच लैंग ने अपने दावों के समर्थन में वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का हवाला दिया, जिसमें भारत की रैंकिंग 157 है। यह रिपोर्ट रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) नामक संस्था जारी करती है, जिसे जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से भारी फंडिंग मिलती है। यह वही जॉर्ज सोरोस हैं, जो खुलेआम भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की बात कर चुके हैं।
इसके अलावा, यह इंडेक्स किसी वैज्ञानिक डेटा पर नहीं, बल्कि चुनिंदा लोगों की प्रश्नावली पर आधारित है। हैरानी की बात यह है कि पत्रकारिता के लिए खतरनाक माने जाने वाले सोमालिया और सीरिया जैसे देशों को भी भारत से बेहतर रैंकिंग दी गई है। यह स्पष्ट रूप से भारत विरोधी उस टूलकिट का हिस्सा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
निवेश और भरोसे का जवाब हेले लैंग ने सवाल किया था कि भारत पर भरोसा क्यों किया जाए? इसका जवाब नॉर्वे और भारत के बीच हुए हालिया समझौतों में छिपा है। नॉर्वे ने भारत के शेयर बाजार में डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर रखा है। इतना ही नहीं, अगले 15 वर्षों में 95 लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य दोनों देशों के बीच संबंधों की मजबूती को दर्शाता है। आर्थिक स्थिरता और लोकतंत्र का प्रमाण इससे बड़ा और क्या हो सकता है?
विपक्ष और विदेशी नैरेटिव दुखद यह है कि भारत के कुछ राजनेताओं ने भी इस विदेशी साजिश में हाथ मिलाया है। राहुल गांधी द्वारा इस वीडियो को साझा करना और बदले में लैंग द्वारा उन्हें इंटरव्यू के लिए आमंत्रण देना, एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी की ओर इशारा करता है। नॉर्वे की लेबर पार्टी और कांग्रेस के बीच वैचारिक संबंध भी इस इंटरनेशनल अलायंस पर सवाल उठा रहे हैं।
अंत में, भारत और नॉर्डिक देशों के शिखर सम्मेलन का निष्कर्ष यह रहा कि आतंकवाद के खिलाफ भारत का रुख सर्वोपरि है। नॉर्वे सहित तमाम नॉर्डिक देश भारत के साथ ग्रीन एनर्जी, समुद्री सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर सहयोग के लिए पूरी तरह तैयार हैं। भारत की विदेश नीति के लिए यह यात्रा एक मील का पत्थर है, जिसे कुछ डिजायनर पत्रकारों के एजेंडे से कमतर नहीं किया जा सकता।
#DNAमित्रों | डिजायनर पत्रकारों को ग्लोबल लीडर मिल गई!...विदेशी ने भारत को नीचा दिखाया..विपक्ष खुश हुआ
— Zee News (@ZeeNews) May 19, 2026
नॉर्वे की पत्रकार का प्रोपेगेंडा गुरू कौन?#DNA #DNAWithRahulSinha #Norway #India #Jounalist@RahulSinhaTV pic.twitter.com/TmXKfvERMq
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