क्रूड ऑइल की टेंशन खत्म: अब हवा से बनेगा पेट्रोल-डीजल, जापान ने कर दिखाया कमाल
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योकोहामा: ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसी खोज हुई है जो भविष्य की तस्वीर बदल सकती है। जापान की सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनी ने हवा से ईंधन बनाने की तकनीक विकसित कर ली है। यह उन देशों के लिए एक बड़ी राहत है जो अपनी ईंधन जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं।

हवा और पानी से ईंधन का निर्माण जापान की प्रमुख रिफाइनरी कंपनी ने योकोहामा में दुनिया का पहला इंटीग्रेटेड सिंथेटिक फ्यूल डेमो प्लांट स्थापित किया है। यह प्लांट हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और पानी से हाइड्रोजन लेकर पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल तैयार कर रहा है। यह तकनीक पारंपरिक ईंधन का एक बेहतरीन और स्वच्छ विकल्प साबित हो सकती है।

कैसे काम करती है यह अनूठी तकनीक? ईंधन बनाने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) तकनीक के जरिए हवा से CO₂ को अलग किया जाता है। इसके बाद सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग कर पानी से हाइड्रोजन बनाया जाता है। अंत में, इन दोनों को फिशर-ट्रोप्स (Fischer-Tropsch) प्रक्रिया के जरिए हाइड्रोकार्बन ईंधन में बदल दिया जाता है।

मौजूदा इंजनों में बदलाव की जरूरत नहीं इस सिंथेटिक ईंधन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बिल्कुल पारंपरिक पेट्रोल-डीजल जैसा है। इसे इस्तेमाल करने के लिए वाहनों के इंजन, पाइपलाइन या रिफाइनरी इंफ्रास्ट्रक्चर में किसी भी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं है। टोयोटा और हिनो जैसी कंपनियों की गाड़ियों में इसका सफल परीक्षण भी किया जा चुका है।

ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक मजबूती भारत, जापान और चीन जैसे देश अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटों का असर कम हो जाएगा। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी, बल्कि देशों की एनर्जी सिक्योरिटी भी मजबूत होगी।

अभी हैं कुछ चुनौतियां फिलहाल, इस प्लांट में हर दिन लगभग 159 लीटर (1 बैरल) ईंधन का उत्पादन हो रहा है। हालांकि, व्यावसायिक स्तर पर इसे उतारना अभी एक बड़ी चुनौती है। कंपनी के अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन और DAC की उच्च ऊर्जा खपत के कारण इसकी लागत फिलहाल अधिक है। लेकिन जैसे-जैसे सोलर और विंड एनर्जी सस्ती होगी, सिंथेटिक ईंधन की राह आसान होती जाएगी। शोध जारी है और उम्मीद है कि भविष्य में यह तकनीक दुनिया की ईंधन की परिभाषा बदल देगी।

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