वैभव सूर्यवंशी बनाने की सनक: क्या सफलता पाने के लिए बचपन को टॉर्चर करना जरूरी है?
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सोशल मीडिया पर एक वीडियो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसे देखकर किसी का भी दिल पसीज जाए। इस वीडियो में एक मासूम बच्चा नेट प्रैक्टिस के दौरान रोते हुए अपने पिता से मिन्नतें कर रहा है कि वह और नहीं खेलना चाहता। इस दृश्य ने खेल की दुनिया में माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

खौफ में बच्चा, जिद पर अड़ा पिता वीडियो में दिख रहा बच्चा लगातार रोते हुए कह रहा है, मैं नहीं खेलूंगा पापा, मुझे चोट लग जाएगी। उसके चेहरे पर स्पष्ट डर है, लेकिन पिता पर जैसे सफलता का भूत सवार है। वह बच्चे की भावनाओं को दरकिनार करते हुए उसे लगातार नेट्स की तरफ धकेल रहा है। बच्चा बार-बार पीछे हटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे चारों तरफ से घेरा गया है।

वैभव सूर्यवंशी की आंधी और गलत प्रेरणा हाल ही में कम उम्र में वैभव सूर्यवंशी की विस्फोटक बल्लेबाजी ने हर भारतीय माता-पिता के मन में एक उम्मीद जगाई है। हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा अगला क्रिकेट स्टार बने। लेकिन, इस होड़ में कई अभिभावक यह भूल रहे हैं कि वैभव की सफलता के पीछे उनकी अपनी इच्छाशक्ति और तकनीक थी। 10-12 साल के बच्चे को, जो अभी गेंद की रफ्तार को समझने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व नहीं है, उसे जबरदस्ती खतरनाक पेसर्स के सामने खड़ा करना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।

ट्रेनिंग या टॉर्चर? वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पिता और भाई मिलकर बच्चे को जबरदस्ती रिब पैड्स और ग्लव्स पहना रहे हैं। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि इस उम्र में खेल को एक आनंद के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि बच्चा लेदर बॉल और तेज गेंदबाजी से डर रहा है, तो उसे धीरे-धीरे तैयार करना चाहिए, न कि उसे मौत के कुएं में धकेल देना चाहिए। सोशल मीडिया पर लोग इसे ट्रेनिंग के बजाय बच्चों के साथ क्रूरता और टॉर्चर बता रहे हैं।

क्या कहते हैं खेल मनोवैज्ञानिक? मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यदि किसी बच्चे के मन में बचपन में ही खेल के प्रति डर बैठ जाए, तो वह जीवनभर उस चीज से दूरी बना लेता है। पिता की यह जिद उस बच्चे को वैभव सूर्यवंशी तो नहीं, बल्कि हमेशा के लिए खेल के मैदान से दूर जरूर कर सकती है। खेल में मानसिक मजबूती सबसे महत्वपूर्ण है, और डरा हुआ बच्चा कभी भी अपनी प्रतिभा का सही प्रदर्शन नहीं कर सकता।

माता-पिता को यह समझने की जरूरत है कि हर बच्चा अलग होता है और उसकी क्षमताएं भी भिन्न होती हैं। जबरदस्ती के पैड बांधकर आप उसे मैदान में तो भेज सकते हैं, लेकिन उसके अंदर के खिलाड़ी को आप कभी जीवित नहीं कर पाएंगे। क्या किसी का सपना पूरा करने के लिए किसी का बचपना छीनना सही है? यह सवाल अब हर किसी के मन में है।

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