पापा को बचा लीजिए चीखती रही बेटी, लेकिन सिस्टम बेपरवाह; जौनपुर अस्पताल में तड़पकर गई जान
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उत्तर प्रदेश के जौनपुर से एक अत्यंत हृदयविदारक मामला सामने आया है। जिला अस्पताल की कथित लापरवाही के कारण एक मरीज की जान चली गई। अस्पताल के गलियारों में पिता के शव के पास बिलखती बेटी की चीखें अब स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों को कठघरे में खड़ा कर रही हैं।

चार दिन की भर्ती और केवल उपेक्षा

मृतक की पहचान सतीश गुप्ता के रूप में हुई है, जिन्हें चार दिन पहले जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में उन्हें उपचार के नाम पर केवल औपचारिकता मिली। ग्लूकोज की बोतलें चढ़ाने के बाद न तो डॉक्टरों ने मरीज की स्थिति पर गौर किया और न ही नर्सिंग स्टाफ ने उनकी सुध ली।

आधे घंटे तड़पते रहे, पर कोई नहीं आया

बेटी का आरोप है कि अंतिम समय में उसके पिता करीब आधे घंटे तक दर्द से छटपटाते रहे। वह बार-बार नर्सों और कर्मचारियों के पास जाकर मदद की गुहार लगाती रही, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। एक कर्मचारी आया भी, तो मरीज को देखकर बिना किसी मदद के वापस लौट गया। पिता के दम तोड़ने तक अस्पताल प्रशासन का रवैया संवेदनहीन बना रहा।

बाहर से मंगवाई गई दवाइयां

इलाज की बदहाली का आलम यह था कि अस्पताल के भीतर जरूरी दवाइयां और इंजेक्शन तक उपलब्ध नहीं थे। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिजनों को छोटी-छोटी चीजों के लिए बाहर की दुकानों पर निर्भर रहना पड़ा। सरकारी अस्पताल की खस्ताहाल व्यवस्था ने मरीज और उसके परिवार पर मानसिक और आर्थिक, दोनों तरह का बोझ डाल दिया।

सोशल मीडिया पर फूटा आक्रोश

घटना का वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। यूजर्स का कहना है कि यदि समय पर मेडिकल रिस्पॉन्स मिलता, तो शायद एक जान बच सकती थी। लोग सरकारी अस्पतालों में गरीबों के साथ होने वाले कथित अमानवीय व्यवहार पर सवाल उठा रहे हैं और दोषी स्टाफ पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

क्या दावे केवल विज्ञापनों तक सीमित?

यूपी सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जौनपुर की यह घटना जमीनी हकीकत को बयां करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के बावजूद, मानवीय संवेदनाओं का अभाव सबसे बड़ी समस्या है।

अब इस मामले ने प्रशासन को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। पीड़ित परिवार अब न्याय की मांग कर रहा है। क्या अस्पताल प्रशासन इस लापरवाही की जिम्मेदारी लेगा या यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा? यह सवाल हर उस व्यक्ति को झकझोर रहा है, जो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के भरोसे अपनी जान बचाने अस्पताल पहुंचता है।

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