क्या झारखंड भाजपा का सिस्टम आउटडेटेड हो गया है? पार्टी में अब सॉफ्टवेयर बदलने की मांग
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत और सरकार बनने के बाद पार्टी का कैडर बेहद उत्साहित है। लेकिन इस उत्साह के बीच झारखंड भाजपा के लिए स्थिति किसी बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी हो गई है। पड़ोसी राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल—में भगवा परचम लहरा रहा है, लेकिन झारखंड का किला फतह करना पार्टी के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है।

गंगोत्री से गंगासागर के बीच सूखा कमल भाजपा आलाकमान अक्सर गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा की जीत का दावा करता है। तकनीकी रूप से यह दावा झारखंड में आकर दम तोड़ देता है। राजमहल के रास्ते झारखंड से होकर बहने वाली गंगा के बावजूद, राज्य में भाजपा लगातार दो विधानसभा चुनाव (2019 और 2024) हार चुकी है। भविष्य की डगर भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि बांग्लादेशी घुसपैठ और बदलती जनसांख्यिकी ने समीकरणों को और कठिन बना दिया है।

आदिवासी सीटों पर भाजपा की विफलता झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास मात्र एक (चंपाई सोरेन) सीट है। यह आंकड़ा आदिवासियों के बीच पार्टी की गिरती पकड़ का जीवंत प्रमाण है। पार्टी के प्रमुख आदिवासी चेहरे—बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा—अब मतदाताओं के बीच पहले जैसा आकर्षण नहीं पैदा कर पा रहे हैं।

नेतृत्व और संगठन पर उठते सवाल भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को आगे बढ़ाया और ओडिशा-छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री दिए हैं। इसके बावजूद, झारखंड में पार्टी की बात जनता तक पहुंचाने वाला जमीनी नेतृत्व नदारद है। जानकारों का मानना है कि प्रदेश अध्यक्ष स्तर से लेकर निचले पायदान तक कहीं कोई प्रभावी अपील नहीं दिख रही है।

सिस्टम फॉर्मेट करने की उठी मांग सोशल मीडिया पर झारखंड भाजपा को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं जारी हैं। भाजपा विचारधारा से जुड़ीं माउंटेन बाइक राइडर कंचन उगुरसांडी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर एक वायरल पोस्ट के जरिए तल्ख टिप्पणी की है। उन्होंने सीधे तौर पर कहा है कि झारखंड भाजपा का सिस्टम अब आउटडेटेड हो चुका है और इसे पूरी तरह फॉर्मेट कर नया सॉफ्टवेयर डालने की जरूरत है।

पार्टी के भीतर और बाहर अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या पुराने चेहरों और ढर्रे पर चलकर झारखंड में कमल खिल पाएगा? फिलहाल, झारखंड भाजपा के सामने न केवल एक मजबूत विपक्ष का सामना करने की चुनौती है, बल्कि अपने ही घर में खोई हुई साख को वापस पाने के लिए एक बड़े संगठनात्मक बदलाव की भी जरूरत दिख रही है।

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