सुवेंदु अधिकारी का अग्निपथ : मुख्यमंत्री बनते ही सामने होंगी ये बड़ी चुनौतियां
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में 9 मई का दिन एक ऐतिहासिक बदलाव लेकर आ रहा है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर ब्रिगेड परेड ग्राउंड में सुवेंदु अधिकारी राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। यह पहली बार है जब बंगाल में बीजेपी की सरकार का गठन हो रहा है।

ब्रिगेड में भव्य तैयारी शपथ ग्रहण समारोह को अभूतपूर्व बनाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। 15 हजार से अधिक लोगों की मौजूदगी के बीच सुवेंदु अधिकारी पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं, जिसमें एसपीजी से लेकर सीआईएसएफ और स्थानीय पुलिस के 8,000 जवान तैनात रहेंगे। पूरा इलाका नो फ्लाइंग जोन घोषित किया गया है।

जाइंट किलर से मुख्यमंत्री तक का सफर सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक करियर बेहद दिलचस्प रहा है। 1995 में पार्षद से शुरुआत करने वाले सुवेंदु 2007 के नंदीग्राम आंदोलन के पोस्टर बॉय रहे। ममता बनर्जी को उनकी ही सीट नंदीग्राम और फिर भवानीपुर में हराकर वे जाइंट किलर के रूप में स्थापित हुए। साल 2020 में बीजेपी में शामिल होने के बाद अब वे बंगाल टाइगर के रूप में राज्य की कमान संभालेंगे।

चुनौती नंबर 1: कानून-व्यवस्था और सिंडिकेट का खात्मा सुवेंदु के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल की बदहाल कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना है। राज्य महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में देश में चौथे स्थान पर है। साथ ही, बांग्लादेशी घुसपैठ और अपराधियों के सिंडिकेट को तोड़ना भी एक बड़ी अग्निपरीक्षा है। राजनीतिक हिंसा से मुक्त बंगाल बनाना नई सरकार की पहली प्राथमिकता होगी।

चुनौती नंबर 2: अर्थव्यवस्था का सुधार बंगाल की आर्थिक स्थिति बेहद चिंताजनक है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय देश में 21वें स्थान पर है, जो कि इसकी जनसंख्या और क्षेत्रफल के अनुपात में बहुत कम है। राज्य पर भारी कर्ज का बोझ है—राज्य की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 34 प्रतिशत हिस्सा कर्ज में डूबा है। निवेशकों के लिए नो गो जोन बन चुके बंगाल में फिर से औद्योगिक वातावरण तैयार करना सुवेंदु के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

सोनार बांग्ला का सपना गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि नई सरकार की प्राथमिकताओं में सोनार बांग्ला का निर्माण सर्वोपरि है। सुवेंदु अधिकारी के सामने भारी जन-आकांक्षाएं हैं। 15 साल बाद हुए इस सत्ता परिवर्तन को वे केवल एक प्रशासनिक बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि बंगाल की खोई हुई गरिमा और आर्थिक समृद्धि की वापसी के रूप में पेश करने की कोशिश करेंगे।

कुल मिलाकर, सुवेंदु अधिकारी के लिए यह ताज कांटो भरा है। उन्हें न केवल पिछली सरकार की विफलताओं का बोझ ढोना होगा, बल्कि एक भयमुक्त और विकसित बंगाल की नई नींव भी रखनी होगी।

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