संयुक्त राष्ट्र: शांति का मसीहा या ‘एंटी इंडिया गैंग’ का नया अड्डा?
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क्या संयुक्त राष्ट्र (UN) अब वैश्विक शांति के बजाय एक खास विचारधारा को बढ़ावा देने वाली कठपुतली बन गया है? जिस संस्थान का निर्माण दुनिया को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए हुआ था, आज वही भारत के खिलाफ जहर उगलने का केंद्र बनता जा रहा है।

गाजा प्रेमी मैडम और भारत पर निशाना

संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की विशेष दूत फ्रांसेस्का अल्बनीज ने हाल ही में टॉर्चर एंड जेनोसाइड नाम से एक रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट तो गाजा पर केंद्रित है, लेकिन इसमें सबसे ज्यादा जहर भारत के खिलाफ उगला गया है। उनका आरोप है कि भारत इजरायल को हथियार भेजकर नरसंहार में शामिल है। हैरानी की बात यह है कि हमला इजरायल कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर कटघरे में भारत को खड़ा किया जा रहा है। यह तर्क नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रोपेगेंडा है।

सिलेक्टिव एजेंडा: ईरान और पाकिस्तान पर चुप्पी

फ्रांसेस्का जैसे मानवाधिकार प्रेमियों की नजरें केवल भारत पर क्यों रहती हैं? ईरान में अमेरिकी हमलों के दौरान मासूम लड़कियों की मौत पर ये लोग खामोश रहे। पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान में किए जा रहे नरसंहार और अफगानिस्तान में हो रहे अत्याचारों पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट क्यों नहीं आती? क्योंकि इनका मकसद मानवाधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि भारत जैसे लोकतंत्र की छवि को धूमिल करना है।

करोड़ों का खर्च, सिर्फ भारत को बदनाम करने के लिए

एक रिपोर्ट को तैयार करने में करीब 14 करोड़ रुपये का खर्च आता है। इस रिपोर्ट की कोई कानूनी बाध्यता या शक्ति नहीं होती, फिर भी इसे क्यों बनाया जाता है? जवाब सीधा है— नैरेटिव बनाने के लिए। इन रिपोर्टों का इस्तेमाल भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी माहौल तैयार करने के लिए किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी अपनी नौकरी और एजेंडे को जस्टिफाई करने के लिए इन संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या UN पर ताला लगाने का समय आ गया है?

वोल्कर तुर्क, टॉम एंड्रयूज और एंटोनियो गुटेरेस जैसे नाम इस सूची में शामिल हैं, जो समय-समय पर भारत को मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन शक्तिशाली देशों के सामने इनकी आवाज नहीं निकलती। जब एक शक्तिशाली संस्था केवल स्वार्थ और एजेंडे के लिए काम करने लगे, तो उसकी प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। यदि संयुक्त राष्ट्र अपनी तटस्थता खो चुका है, तो क्या यह कहना गलत होगा कि इस संगठन को अब अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए या इसे बंद कर देना चाहिए?

यह समय है कि हम इन भारत-विरोधी नैरेटिव्स को पहचानें और समझें कि कैसे वैश्विक मंचों का इस्तेमाल भारत की प्रगति को रोकने के लिए किया जा रहा है।

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