महिला आरक्षण पर आर-पार: कांग्रेस ने ‘26 योद्धाओं’ के साथ खोला मोर्चा, मोदी सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
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कांग्रेस ने महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ देशव्यापी मोर्चा खोल दिया है। पार्टी की महिला नेताओं ने देश के 26 प्रमुख शहरों में एक साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र सरकार को घेरा और संसद के विशेष सत्र को लेकर बड़ा आरोप लगाया।

‘महिला आरक्षण नहीं, परिसीमन है असली मकसद’ कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण का ढोंग कर रही है। नेताओं का दावा है कि सरकार का असल उद्देश्य महिला आरक्षण की आड़ में ‘परिसीमन’ (Delimitation) के जरिए अपनी सत्ता को सुरक्षित करना है। कांग्रेस के अनुसार, यह कदम महिलाओं को आगे बढ़ाने के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए सीटों के पुनर्गठन की एक चाल है।

तत्काल लागू करने की मांग अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की सचिव अंजली निम्बालकर ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस आरक्षण के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा को 2029 के चुनावों की चिंता छोड़कर 2023 के महिला आरक्षण विधेयक को बिना किसी देरी के तुरंत लागू करना चाहिए। उन्होंने जातिगत जनगणना की मांग दोहराते हुए कहा कि आरक्षण का आधार जनगणना के आंकड़े होने चाहिए।

रंजीत रंजन का तीखा हमला राज्यसभा सांसद रंजीत रंजन ने रायपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए भाजपा पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम सितंबर 2023 में ही पास होकर कानून बन चुका है, लेकिन सरकार ने इसे अभी तक लागू नहीं किया। उन्होंने सवाल किया कि जब 2026-27 में नई जनगणना होनी है, तो सरकार पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन क्यों थोप रही है?

‘बिना परिसीमन के आरक्षण क्यों नहीं?’ कांग्रेस ने सरकार को चुनौती दी है कि अगर वह महिलाओं को आरक्षण देने के लिए ईमानदार है, तो परिसीमन का इंतजार किए बिना मौजूदा सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करे। पार्टी का कहना है कि विपक्ष इसके लिए पूर्ण समर्थन देने को तैयार है, लेकिन इसे परिसीमन की जटिलताओं में फंसाकर टालना सरासर गलत है।

गहलोत बोले- कथनी और करनी में अंतर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी भाजपा पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि तीन साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने कानून का नोटिफिकेशन जारी नहीं किया और अब जो बदलाव लाए जा रहे हैं, वे मनमर्जी के परिसीमन के लिए हैं। कांग्रेस का यह देशव्यापी अभियान अब मोदी सरकार पर दबाव बनाने और समान विचारधारा वाले विपक्षी दलों को लामबंद करने की एक बड़ी रणनीतिक कोशिश माना जा रहा है।

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