नीतीश के इस्तीफे के 7 दिन बाद भी JDU में सन्नाटा: नेता चुनने में क्यों फंसी है पार्टी?
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बिहार के मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफे को एक सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन जनता दल यूनाइटेड (JDU) अब तक अपने नए विधानमंडल दल के नेता का चुनाव नहीं कर पाई है। 14 अप्रैल और आज 20 अप्रैल को हुई बैठकों के बावजूद पार्टी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। फिलहाल, सभी विधायकों ने इस जिम्मेदारी के लिए नीतीश कुमार को ही अधिकृत कर दिया है।

आखिर पार्टी नेता चुनने में इतनी देरी क्यों कर रही है? इसके पीछे के तीन प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं:

1. सर्वमान्य चेहरे का भारी संकट

JDU के लिए सबसे बड़ी चुनौती नीतीश कुमार के कद का विकल्प ढूंढना है। पार्टी में ललन सिंह, संजय झा, विजय चौधरी, विजेंद्र प्रसाद यादव और अशोक चौधरी जैसे कद्दावर नाम तो हैं, लेकिन नीतीश जैसी स्वीकार्यता किसी में नहीं दिखती। ललन सिंह और संजय झा सांसद हैं, जबकि अन्य नेताओं के नाम पर पार्टी के भीतर ही एकराय नहीं बन पा रही है। बिना सर्वमान्य चेहरे के चयन से पार्टी में गुटबाजी का डर बना हुआ है।

2. निशांत को लेकर असमंजस

पार्टी आलाकमान का एक बड़ा हिस्सा निशांत को भविष्य के नेता के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहता है। उन्हें डिप्टी सीएम बनाने की चर्चा भी इसी रणनीति का हिस्सा थी। हालांकि, निशांत का मानना है कि उन्हें पहले संगठन और सरकार को गहराई से समझने की जरूरत है। इसी कारण उन्होंने फिलहाल किसी भी बड़े पद को लेने से इनकार कर दिया है। लीडरशिप और निशांत की व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के बीच का यह फासला निर्णय में देरी की मुख्य वजह है।

3. सामाजिक समीकरणों को साधने की जद्दोजहद

नीतीश कुमार ने हमेशा सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता संभाली है। उन्होंने अगड़ी जाति के विजय चौधरी और पिछड़ी जाति के विजेंद्र प्रसाद यादव को डिप्टी सीएम बनाकर वर्गों को संतुलित रखा था। अब नया नेता चुनते वक्त पार्टी को यह डर सता रहा है कि कोई एक नाम किसी खास जाति वर्ग को नाराज न कर दे। पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो JDU के मौजूदा सामाजिक आधार को अक्षुण्ण रख सके।

आगे की राह क्या? फिलहाल पार्टी ने नीतीश कुमार पर पूरा भरोसा जताया है। संकेत मिल रहे हैं कि अब नीतीश और निशांत दोनों मिलकर पूरे बिहार का दौरा करेंगे। माना जा रहा है कि इस दौरे के जरिए वे जमीनी फीडबैक लेंगे और संगठन की नब्ज टटोलेंगे, ताकि आने वाले समय में एक ऐसा निर्णय लिया जा सके जिसे पूरे राज्य और पार्टी में स्वीकार किया जाए।

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