महिला आरक्षण कानून पर सियासी संग्राम: लागू हुआ कानून, पर उलझ गए संशोधन!
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अजीब स्थिति: कानून लागू, पर संशोधन पर बहस जारी केंद्र सरकार द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 16 अप्रैल 2026 से लागू करने की अधिसूचना जारी होते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे बेहद अजीब और भ्रमित करने वाला कदम बताया है। उनका तर्क है कि जब कानून को लेकर तीन संशोधनों पर संसद में बहस चल रही है और कल मतदान होना है, तो इसे लागू करने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी?

प्रक्रिया पर उठे पारदर्शिता के सवाल जयराम रमेश ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए पहले संशोधनों पर फैसला लेना चाहिए था। विपक्ष का मानना है कि संशोधन प्रक्रिया के बीच अधिसूचना जारी करने से न केवल पारदर्शिता की कमी दिखती है, बल्कि पूरे मुद्दे पर एक भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है।

वास्तविक लाभ कब मिलेगा? कानून मंत्रालय की अधिसूचना के बावजूद, इस आरक्षण का तत्काल लाभ मिलना मुश्किल है। नियमों के अनुसार, महिला आरक्षण का लाभ तभी मिल सकेगा जब जनगणना के बाद परिसीमन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। कानून में पूर्व निर्धारित प्रावधानों के तहत, यह प्रक्रिया 2027 की जनगणना के बाद ही शुरू होगी। जानकारों का कहना है कि इसका वास्तविक असर 2034 के चुनाव के बाद ही जमीन पर दिखाई देगा।

संशोधनों की जरूरत क्यों? ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब कानून का क्रियान्वयन वर्षों दूर है, तो फिर सरकार उसी कानून में संशोधन के लिए बिल क्यों ला रही है? सरकार का पक्ष है कि अधिसूचना जारी करना एक औपचारिक वैधानिक प्रक्रिया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, कानून को प्रभावी बनाने के लिए अधिसूचना जरूरी थी, जबकि प्रस्तावित संशोधन तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताओं को दूर करने के लिए लाए जा रहे हैं।

विपक्ष का हमला विपक्ष इसे सरकार की दोहरी नीति बता रहा है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार एक तरफ कानून लागू करने का श्रेय ले रही है, तो दूसरी तरफ उसमें संशोधन कर रही है। स्थिति यह है कि एक ही समय में कानून लागू भी हो रहा है और उसमें बदलाव पर बहस भी हो रही है, जिससे आम जनता और राजनीतिक जानकारों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

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