नारी शक्ति वंदन: क्या 33% आरक्षण से बदल जाएगी भारतीय राजनीति की तस्वीर?
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भारतीय राजनीति में दशकों से हाशिए पर खड़ी आधी आबादी को अब संवैधानिक सुरक्षा कवच मिलने जा रहा है। संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने वाला विधेयक चर्चा के केंद्र में है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर के शब्दों में, राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक समाज के हर वर्ग, खासकर महिलाओं को समान प्रतिनिधित्व न मिले। अब यह अधूरा सपना साकार होने की दहलीज पर है।

तीन बिल और एक बड़ा लक्ष्य

सरकार ने संसद के विशेष सत्र में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं को उनका हक दिलाना है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संविधान का 131वां संशोधन विधेयक, 2026 और परिसीमन विधेयक, 2026 पेश किया, जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक, 2026 सदन के पटल पर रखा।

ये तीनों बिल आपस में जुड़े हैं। इनका मुख्य मकसद न केवल महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करना है, बल्कि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करना है। इसके लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जो नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करेगा।

अंकगणित: सरकार को विपक्ष के साथ की दरकार

यह विधेयक संविधान के मूल ढांचे में बदलाव करेगा। इसके लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। वर्तमान में एनडीए के पास 293 सदस्य हैं, जबकि 362 के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए सरकार को विपक्ष के कम से कम 69 सांसदों के समर्थन की जरूरत है। यही कारण है कि सत्ता पक्ष इसे राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में देखने की अपील कर रहा है।

परिसीमन का विवाद और हकीकत

जहां एक ओर महिला आरक्षण का स्वागत हो रहा है, वहीं कुछ विपक्षी दल परिसीमन के फार्मूले पर सवाल उठा रहे हैं। आरोप है कि इससे दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है। हालांकि, सरकार का तर्क है कि हर राज्य में सीटों की संख्या बढ़ेगी, जिससे सभी दलों को फायदा होगा। पिछले 50 वर्षों से लोकसभा सीटें स्थिर रही हैं, जबकि देश की जनसंख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है। 1976 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाई गई फ्रीज अब खत्म हो रही है, जिससे सीटों का बढ़ना अनिवार्य हो गया है।

महिलाएं: संसद में बेहतर प्रदर्शन की गवाह

आंकड़े बताते हैं कि जब-जब महिलाओं को मौका मिला है, उन्होंने खुद को साबित किया है। 17वीं लोकसभा में महिला सांसदों की भागीदारी केवल 14.5% थी, फिर भी प्रश्न पूछने की औसत दर पुरुष सांसदों से 10% अधिक रही। वे न केवल अधिक संवेदनशील हैं, बल्कि विधायी कार्यों में भी उतनी ही सक्रिय हैं।

क्या 850 सीटें पर्याप्त हैं?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले भारत में एक सांसद पर मतदाताओं का भार बहुत अधिक है। 1952 में एक सांसद करीब 7 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था, जो अब बढ़कर 25 लाख से अधिक हो गया है। एक अमेरिकी वैज्ञानिक के क्यूब रूट लॉ के अनुसार, भारत में 1119 सीटें होनी चाहिए। ऐसे में प्रस्तावित 850 सीटें, बढ़ती जनसंख्या और लोकतंत्र की मजबूती के बीच एक आवश्यक संतुलन बनाने की दिशा में पहला कदम है।

यह बिल केवल सीटों का गणित नहीं है, बल्कि उस शक्ति, स्वतंत्रता और नेतृत्व का प्रतीक है, जिसके बिना किसी भी राष्ट्र की प्रगति अधूरी है। अब सबकी निगाहें शुक्रवार की वोटिंग पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या भारत की राजनीति अब वास्तव में समावेशी होने जा रही है।

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