डीएम-सीएम के आदेशों के बाद भी नोएडा में क्यों भड़के मजदूर? जानिए हिंसा की असली वजह
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नोएडा और दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में सोमवार को मजदूरों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। वेतन वृद्धि और ओवरटाइम की मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे मजदूरों ने कई जगहों पर आगजनी और पत्थरबाजी की। हैरान करने वाली बात यह है कि यह हिंसा तब हुई, जब ठीक एक दिन पहले ही प्रशासन और सरकार ने उनकी समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया था। आखिर क्यों भड़के ये मजदूर? आइए समझते हैं।

मजदूरों की दो मुख्य मांगें सड़कों पर उतरे मजदूरों का मुख्य दर्द उनकी कम कमाई है। विरोध कर रहे अधिकांश श्रमिक 15,000 रुपये से कम वेतन में काम करने को मजबूर हैं। उनकी दो प्रमुख मांगें हैं: पहला, न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर 20,000 रुपये किया जाए। दूसरा, उनसे लिए जा रहे 12 घंटे के काम का उचित ओवरटाइम भुगतान उन्हें मिले।

क्यों बनी हरियाणा फैक्टर की चुनौती? नोएडा के मजदूरों के आक्रोश के पीछे हरियाणा फैक्टर एक बड़ी वजह है। हाल ही में हरियाणा सरकार ने अपने राज्य में न्यूनतम मजदूरी में 35 फीसदी तक का इजाफा किया है। वहां अनस्किल्ड से लेकर हाई-स्किल्ड वर्कर्स तक का वेतन 15,000 से 19,000 रुपये के बीच तय कर दिया गया है। पड़ोसी राज्य में मिली इस राहत को देखते हुए नोएडा के श्रमिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और यूपी सरकार से भी इसी तर्ज पर वेतन ढांचा लागू करने की मांग कर रहे हैं।

प्रशासन के 7 निर्देश, फिर भी नाराजगी क्यों? घटना से एक दिन पहले डीएम मेधा रूपम ने 7 कड़े निर्देश जारी किए थे, जिनमें ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, समय पर सैलरी, बोनस, साप्ताहिक छुट्टी और महिलाओं की सुरक्षा के लिए समितियां बनाना शामिल था। सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी श्रमिकों को सम्मानजनक मानदेय देने की बात कही।

हालांकि, मजदूरों की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह यह है कि इन सरकारी निर्देशों में कहीं भी न्यूनतम वेतन की निश्चित राशि बढ़ाने का जिक्र नहीं था। मजदूर केवल निर्देशों से संतुष्ट नहीं हैं; वे ठोस आंकड़ों के साथ वेतन वृद्धि चाहते हैं।

प्रशासन की अपील और मौजूदा स्थिति फिलहाल प्रशासन ने जिले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है और श्रमिकों की समस्याओं के समाधान के लिए कंट्रोल रूम भी स्थापित किए हैं। साथ ही, औद्योगिक इकाइयों को श्रम कानूनों का सख्ती से पालन करने का आदेश दिया गया है। लेकिन, जब तक वेतन ढांचे में बदलाव जैसी उनकी बुनियादी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक औद्योगिक क्षेत्रों में तनाव कम होता नहीं दिख रहा है।

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