अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस्लामाबाद में हो रही शांति वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। इस बीच पाकिस्तान के पूर्व हाई कमिश्नर अब्दुल बासित ने इस वार्ता की चुनौतियों और संभावनाओं पर अपनी राय रखी है।
समझौता क्यों है मुश्किल? अब्दुल बासित के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी समझौते पर पहुंचना फिलहाल आसान नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर कड़ा दबाव बनाए हुए हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान भी अपनी पूर्व निर्धारित शर्तों पर मजबूती से अड़ा हुआ है। दोनों पक्षों के रुख में नरमी न आने से गतिरोध बरकरार है।
लचीलेपन की दरकार बासित का मानना है कि किसी भी कूटनीतिक समझौते के लिए दोनों पक्षों का लचीला रुख अपनाना अनिवार्य है। हालांकि, वार्ताओं का दौर शुरू हो चुका है और दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद में मौजूद हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि इस प्रक्रिया से कोई सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
पाकिस्तान की मध्यस्थता और चुनौतियां पाकिस्तान इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। बासित के अनुसार, ईरान के 10 सूत्रीय एजेंडे और अमेरिका की 15 शर्तों के बीच एक बीच का रास्ता निकालने की चुनौती सबसे बड़ी है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया को युद्ध के खतरे से बचाना है।
युद्ध टालने की प्राथमिकता पूर्व राजनयिक ने स्पष्ट किया कि कोई भी इस वार्ता के अंतिम परिणाम की गारंटी नहीं ले सकता। लेकिन पाकिस्तान का पुराना कूटनीतिक अनुभव इसमें मददगार साबित हो सकता है। फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता यही है कि दोनों देशों के बीच किसी भी तरह का सैन्य संघर्ष न छिड़े।
अगर 14 दिनों की इस अवधि में कोई ठोस समझौता नहीं भी हो पाता है, तो कम से कम बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ना ही बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। फिलहाल, पूरी दुनिया इसी दुआ के साथ देख रही है कि वार्ता से शांति का कोई सार्थक रास्ता निकल सके।
#WATCH | अमेरिका ईरान की शर्त मानने को तैयार नहीं है, बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी?
— ABP News (@ABPNews) April 11, 2026
देखिए महादंगल चित्रा त्रिपाठी (@chitraaum) के साथ |
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