अगस्त 1946 का दौर भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। मोहम्मद अली जिन्ना और तत्कालीन बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी ने एक साजिश रची थी—कलकत्ता (कोलकाता) को अपने प्रस्तावित पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की। यदि जिन्ना की यह योजना कामयाब होती, तो आज कोलकाता भारत के नक्शे पर नहीं, बल्कि बांग्लादेश का हिस्सा होता। लेकिन इस साजिश के बीच एक दीवार बनकर खड़े हुए थे—गोपालचंद्र मुखर्जी, जिन्हें गोपाल पाठा के नाम से जाना जाता है।
कौन थे गोपाल पाठा? गोपाल मुखर्जी का जन्म 1913 में कोलकाता में हुआ था। उनका परिवार कॉलेज स्ट्रीट पर मांस की दुकान चलाता था, इसलिए बंगाली में पाठा (बकरा) उपनाम उनके नाम के साथ जुड़ गया। पुलिस उन्हें एक क्रिमिनल की नजर से देखती थी, लेकिन वास्तविकता यह थी कि उन्होंने युवाओं की एक ऐसी आर्मी तैयार की थी, जो हिंदुओं की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थी।
जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन और नरसंहार की साजिश जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) का ऐलान किया था। इसका मकसद बलपूर्वक कोलकाता पर कब्जा करना था। सुहरावर्दी ने मस्जिदों से भड़काऊ भाषण दिए, जिसके बाद शहर दंगों की आग में झुलस गया। हजारों हिंदुओं को मारा गया, दुकानें जलाई गईं और महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ।
गोपाल पाठा का मोर्चा जब शहर जल रहा था, गोपाल पाठा ने अपने लड़ाकों के साथ मोर्चा संभाला। उन्होंने डंडों से लेकर रिवॉल्वर तक के हथियार जुटाए। इनमें से कई हथियार द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों से हासिल किए गए थे। गोपाल ने अपने लोगों को स्पष्ट निर्देश दिए थे— एक हत्या के जवाब में 10 को मारो। उनके इस आक्रामक रुख ने मुस्लिम लीग के मंसूबों को पस्त कर दिया।
नैतिकता की मिसाल: संकट में भी धर्म का पालन गोपाल पाठा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कठोर नैतिकता थी। उन्होंने अपने लड़कों को साफ निर्देश दिया था कि किसी भी महिला के साथ बदतमीजी नहीं करनी है, चाहे वह मुस्लिम ही क्यों न हो। उन्होंने एक बार कहा था, रावण को भी सीता का अपहरण करने पर बर्बाद होना पड़ा था। मेरा आदेश था कि किसी भी महिला को हाथ नहीं लगाना है।
इतना ही नहीं, गोपाल ने दंगों के बीच कई मुस्लिम परिवारों की जान भी बचाई थी। उनके पोते शांतनु मुखर्जी के अनुसार, गोपाल पाठा ने रिक्शा चलाने वाले रफीक चाचा जैसे कई मुस्लिमों को अपने घरों में शरण देकर उनकी रक्षा की थी।
इतिहास के पन्नों में दर्ज संघर्ष इतिहासकार एंड्रयू व्हाइटहेड के अनुसार, गोपाल पाठा ने एक ऐसे वक्त में शहर की कमान संभाली जब प्रशासन पूरी तरह विफल हो चुका था। उनके प्रतिरोध ने यह सुनिश्चित किया कि कोलकाता का बंटवारा न हो और वह भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहे। वर्ष 2005 में गोपाल मुखर्जी का निधन हो गया, लेकिन आज भी उनके साहस और मानवीय मूल्यों के किस्से कोलकाता की स्वतंत्रता की कहानी बयां करते हैं।
*Submitted the final manuscript of my book on Gopal ‘Patha’ Mukherjee, co-authored by @DebduttaB10.
— Abhijit Majumder (@abhijitmajumder) March 13, 2026
It is a tribute to my birthplace, Kolkata, and the man who saved it from genocidal jihad of Direct Action Day, 1946.
It is also anchored in my growing up at my maternal grandparents… pic.twitter.com/DGIc57Frl2
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