CM से संसद तक: सुशासन बाबू की खामोश विदाई, बिहार की राजनीति में खत्म हुआ एक युग
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नीतीश कुमार का दिल्ली पहुंचना महज एक यात्रा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के इतिहास का एक बड़ा पन्ना पलटने जैसा है। दो दशक तक बिहार की सत्ता का केंद्र रहे नीतीश अब औपचारिक रूप से केंद्र की राजनीति का हिस्सा बनने जा रहे हैं। अगले 18 घंटों में वे राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेंगे और अगले 48 से 60 घंटों के भीतर बिहार के मुख्यमंत्री पद से खुद को अलग कर लेंगे।

एक दौर का भावनात्मक अंत यह विदाई किसी भव्य समारोह या आधिकारिक घोषणा के साथ नहीं हो रही है। माहौल में एक अजीब सी खामोशी और भावुकता है। नीतीश कुमार ने दिल्ली में पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत में कहा, वहां (बिहार) बहुत काम किया, अब यहीं (दिल्ली में) काम करेंगे। उनके ये शब्द महज एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस 20 साल लंबे सफर का पूर्णविराम हैं, जिसने बिहार की तकदीर और तस्वीर दोनों बदली।

बिहार के भगीरथ की विरासत 2005 से शुरू हुआ नीतीश कुमार का यह सफर 2026 में आकर थम रहा है। उन्हें प्यार से नीतीश बाबू या नीतीश चाचा कहने वाली जनता ने उन्हें बिहार का भगीरथ भी माना। चाहे गंगा जल लिफ्ट परियोजना हो, पुल-पुलियों का जाल हो या राज्य की बदलती छवि—उन्होंने बिहार को पलायन और पिछड़ेपन की पहचान से बाहर निकालने के लिए हर संभव प्रयास किया। उनके शासनकाल में बिहार एक जुझारू और विकास की ओर बढ़ते प्रदेश के रूप में उभरा।

सत्ता का हस्तांतरण, साजिश नहीं बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार इकलौते ऐसे चेहरा थे जो हर उतार-चढ़ाव में स्थिर रहे। उन्होंने 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उन पर राजनीति के कई आरोप लगे—कभी पलटू तो कभी छलिया कहा गया—मगर अपनी मर्जी के बिना सत्ता से उनकी विदाई कभी नहीं हुई। लेकिन इस बार कहानी अलग है। सत्ता उनसे छीनी नहीं गई, बल्कि उन्होंने खुद मंच छोड़ने का फैसला किया है। इसीलिए यह बदलाव राजनीतिक कम और भावनात्मक ज्यादा महसूस हो रहा है।

अब आगे क्या? बिहार के सामने बड़ा सवाल नीतीश कुमार के जाने के बाद बिहार की जनता के मन में शून्यता का भाव है। सवाल यह है कि अब बिहार की कमान किसके हाथों में होगी? क्या यह महज पद परिवर्तन है या एक बड़े सत्ता हस्तांतरण की शुरुआत? राजनीतिक गलियारों में निशांत कुमार जैसे नामों की चर्चा तेज हो गई है, लेकिन असली चुनौती उस विकास की स्क्रिप्ट को आगे ले जाने की होगी जिसे नीतीश ने पिछले दो दशकों में लिखा है।

याद आएगी उनकी कार्यशैली विधानसभा के गलियारे, अधिकारियों के साथ उनकी अंतहीन बैठकें और पत्रकारों के साथ उनका सहज संवाद अब अतीत का हिस्सा बनने जा रहा है। नीतीश कुमार का सांसद बनना केवल एक पद की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उस अनुभव और संयम का दिल्ली जाना है जिसने बिहार के कठिन दौर में पूरे प्रदेश को थामे रखा था। कल जब वे शपथ लेंगे, तो वे सिर्फ एक सांसद नहीं होंगे, बल्कि एक पूरे युग के अंत का प्रतिनिधित्व कर रहे होंगे।

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