तमिलनाडु की सियासत में थलपति का तूफान: क्या 2026 में विजय बदलेंगे सत्ता का समीकरण?
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तमिलनाडु की राजनीति दशकों से डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) के इर्द-गिर्द सिमटी रही है। लेकिन बुधवार को थूथुकुडी की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह है कि राज्य में अब एक तीसरी ताकत का उदय हो चुका है। तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) प्रमुख थलपति विजय के रोड-शो ने राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह हिला दिया है।

युवाओं और महिलाओं का सैलाब विजय के रोड-शो में उमड़ी भीड़ में 18 से 35 वर्ष के युवाओं और महिलाओं की संख्या सबसे अधिक थी। यह वही वोट बैंक है जो बदलाव की उम्मीद देख रहा है। इस भीड़ को देखकर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक इसे जयललिता और करुणानिधि के दौर की याद के रूप में देख रहे हैं, जब रैलियों में जनता का ऐसा ही सैलाब उमड़ता था।

डीएमके और एआईएडीएमके के लिए खतरे की घंटी विजय का चुनावी मैदान में उतरना पारंपरिक पार्टियों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। उनका धर्मनिरपेक्ष और क्षेत्रीय गौरव का नैरेटिव सीधे डीएमके के वोट बैंक को प्रभावित कर रहा है। वहीं, नेतृत्व संकट से जूझ रही एआईएडीएमके के लिए विजय उन तटस्थ वोटरों को अपनी ओर खींच रहे हैं, जो उनसे छिटक चुके हैं। उदयनिधि स्टालिन के लिए भी विजय की यह लोकप्रियता एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन का वादा विजय ने अपने अभियान की धुरी एमजीआर (MGR) की विरासत और भ्रष्टाचार मुक्त शासन को बनाया है। थूथुकुडी में उनकी उपस्थिति डीएमके के दक्षिणी किले में सेंध लगाने की सोची-समझी रणनीति है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि स्थापित शक्तियों की अराजकता के खिलाफ स्वतंत्र रूप से लड़ रहे हैं।

किंगमेकर या किंग? राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विजय की मौजूदगी से कम से कम 50-60 विधानसभा सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। यदि चुनाव त्रिशंकु होता है, तो टीवीके की भूमिका किंगमेकर की हो सकती है। हालांकि, पार्टी ने विजय को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश कर पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनका लक्ष्य किंग बनने का है।

बाइनरी राजनीति का अंत? तमिलनाडु में करीब 10-12% फर्स्ट टाइम वोटर हैं, जिनका झुकाव स्पष्ट रूप से विजय की ओर है। थूथुकुडी का यह शक्ति प्रदर्शन केवल एक रैली नहीं, बल्कि तमिलनाडु की दशकों पुरानी बाइनरी राजनीति (दो पार्टियों का खेल) को खत्म करने का आगाज है। अब सबकी निगाहें 23 अप्रैल के मतदान और 4 मई के नतीजों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि थलपति का जादू पर्दे के बाहर चुनावी मैदान में कितना कारगर साबित होता है।

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