ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव इस समय उस मोड़ पर है, जिसे सैन्य विशेषज्ञ कयामत की रात करार दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या मिडिल ईस्ट में एक भीषण युद्ध छिड़ने वाला है? लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) केजेएस ढिल्लों के अनुसार, ईरान को महज हवाई हमलों से डराना नामुमकिन है। ईरान के पास दो ऐसे अचूक हथियार हैं, जो उसके अस्तित्व को सुरक्षित रखते हैं—पहला होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और दूसरी उसकी न्यूक्लियर ताकत ।
सैन्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) केवल मिसाइलों या एयर स्ट्राइक से संभव नहीं है। इसके लिए जमीन पर सेना का होना—जिसे बूट्स ऑन ग्राउंड कहा जाता है—अनिवार्य है। हालांकि, ईरान की भौगोलिक स्थिति और उसकी सैन्य संरचना ऐसी है कि बाहरी सेना के लिए वहां टिकना लगभग असंभव है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की 31 फॉर्मेशन इस तरह से प्रशिक्षित हैं कि नेतृत्व के खत्म होने के बाद भी वे स्वतंत्र रूप से गोरिल्ला युद्ध जारी रख सकती हैं।
अक्सर चर्चा होती है कि अमेरिका अपनी ताकतवर 82nd एयरबोर्न डिवीजन को उतार सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि 15,000 सैनिकों को ईरान की पहाड़ियों में उतारने के लिए सैकड़ों विमानों की जरूरत होगी। हर दिन इन सैनिकों को करीब 1 लाख किलो रसद, पानी और गोला-बारूद की आपूर्ति करनी होगी। ईरान के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों में ऐसी सप्लाई लाइन बनाए रखना किसी भी सेना के लिए एक ऐसा जाल होगा, जिससे निकलना नामुमकिन है।
ईरान का 90% तेल निर्यात खार्ग आइलैंड से होता है। इसे निशाना बनाना अमेरिका के लिए रणनीतिक जरूरत है, लेकिन यह एम्फीबियस ऑपरेशन (जल-थल हमला) सैन्य इतिहास के सबसे कठिन ऑपरेशनों में से एक होगा। ईरान की कोस्टल गन और मोबाइल मिसाइलें इस आइलैंड को सुरक्षा का एक अभेद्य घेरा देती हैं। यहां हमला करने का मतलब है भारी जनहानि को न्योता देना।
अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसका जनमत है। वियतनाम और अफगानिस्तान के युद्धों ने अमेरिका को यह सिखा दिया है कि उसके नागरिक सैनिकों के शवों (बॉडी बैग्स) के घर लौटने को बर्दाश्त नहीं कर सकते। ईरान के खिलाफ एक लंबी जमीनी जंग का मतलब है—भारी संख्या में अमेरिकी सैनिकों की मौत। ईरान का भूगोल गोरिल्ला वॉर के लिए एकदम मुफीद है, जहां विदेशी सेना घुस तो सकती है, लेकिन जिंदा वापस आना एक बड़ी चुनौती होगी।
ईरान बखूबी जानता है कि यदि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य से नियंत्रण हटाया या अपनी न्यूक्लियर क्षमता का सरेंडर किया, तो वह पूरी तरह असहाय हो जाएगा। ईरान ने अपनी मिसाइलें और परमाणु सामग्री पहाड़ों को काटकर बनाई गई गहरी और सुरक्षित सुरंगों में छिपा रखी है। ये बंकर इतने मजबूत हैं कि इजरायल और अमेरिका की तमाम तकनीकी श्रेष्ठता भी इन्हें पूरी तरह नष्ट करने में असमर्थ साबित हुई है।
निष्कर्ष: ईरान को हराना कागजों पर आसान लग सकता है, लेकिन युद्ध के मैदान में यह अमेरिका के लिए एक ऐसा दलदल साबित हो सकता है जहाँ से निकलना आसान नहीं होगा। फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका एक और लंबी, खूनी और अनिश्चित जंग के जोखिम को मोल लेने के लिए तैयार है या कूटनीति के जरिए कोई मध्य मार्ग निकाला जाएगा।
#CNNNews18WarConclave | Regime change can only happen with boots on ground and when there is presence of leadership. Despite of all the type of elimination that has happened, all the 31 formations of IRGC are fighting their individual battles: @TinyDhillon, Former GoC, 15 Corps… pic.twitter.com/1XnYMewUvb
— News18 (@CNNnews18) April 7, 2026
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