सोमालिया में नोट सिलते दर्जी का वीडियो वायरल: क्या बदहाली है या महज एक पब्लिसिटी स्टंट?
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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक हैरान करने वाला वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। वीडियो में एक दर्जी अपनी सिलाई मशीन पर फटे-पुराने नोटों को सिलता हुआ नजर आ रहा है। दावा किया जा रहा है कि सोमालिया में 1991 के बाद से नए नोट नहीं छपे हैं, जिसके कारण वहां के लोग फटे हुए नोटों को जोड़कर काम चलाने के लिए मजबूर हैं।

क्या है वायरल दावे का आधार?

वायरल पोस्ट में कहा जा रहा है कि 1991 में सोमालिया की सरकार गिरने और गृहयुद्ध शुरू होने के बाद से वहां के सेंट्रल बैंक ने आधिकारिक तौर पर नोट छापना बंद कर दिया है। दावा है कि देश की वित्तीय प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और लोग पुराने नोटों को फिर से जोड़कर इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।

आधा सच और गहरा भ्रम

पड़ताल में सामने आया कि यह दावा आंशिक रूप से सही है, लेकिन पूरी तरह भ्रामक है। 1991 के बाद सोमालिया के सेंट्रल बैंक ने आधिकारिक तौर पर नए नोट छापना बंद जरूर किया था। बाजार में जो नोट दिखते हैं, वे या तो 1991 से पहले के हैं या विभिन्न स्थानीय गुटों द्वारा अनौपचारिक रूप से छापे गए हैं। लेकिन, क्या ये नोट वहां की मुख्य अर्थव्यवस्था का आधार हैं? जवाब है—नहीं।

सोमालिया: एक कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता कदम

वास्तविकता यह है कि सोमालिया आज के समय में दुनिया की सबसे उन्नत मोबाइल मनी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। वहां के निवासी बड़े शोरूम से लेकर सड़क किनारे चाय की दुकानों तक डिजिटल भुगतान का सहारा लेते हैं। ZAAD, e-Dahab और Sahal जैसे मोबाइल ऐप वहां भुगतान का मुख्य जरिया बन चुके हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, 80% से अधिक शहरी आबादी आज डिजिटल लेनदेन कर रही है।

तो फिर वीडियो का असली सच क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि बेहद गरीब और दूर-दराज के कुछ इलाकों में फटे नोटों को चलाने की कोशिश जरूर की जाती है, लेकिन यह वहां की पूरी अर्थव्यवस्था की तस्वीर नहीं है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह वीडियो मुख्य रूप से ध्यान आकर्षित करने के लिए बनाया गया है।

निष्कर्ष यह है कि सोमालिया अपनी पुरानी मुद्रा की समस्याओं से जूझ जरूर रहा है, लेकिन देश तेजी से कैशलेस समाज की ओर बढ़ चुका है। ऐसे में, सिलाई मशीन से नोट सिलने वाला वीडियो एक सच्चाई से कहीं अधिक एक इंटरनेट सेंसेशन से प्रेरित है।

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