लेह में अनोखी नीलामी: ईरान के युद्ध पीड़ितों की मदद के लिए 25 हजार में बिका एक अंडा
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लेह: इजरायल और अमेरिका के संयुक्त सैन्य अभियान से जूझ रहे ईरान के लिए लेह में एक अनोखी मिसाल देखने को मिली है। शांति और सहायता के संदेश के साथ आयोजित एक नीलामी में महज 10 रुपये का एक अंडा 25 हजार रुपये में नीलाम हुआ। यह राशि ईरान में युद्ध से प्रभावित लोगों की मदद के लिए जुटाई गई है।

नीलामी का जज्बा लेह के लोगों ने ईरान में पीड़ितों की मदद के लिए चंदा इकट्ठा करने हेतु एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया था। इस आयोजन में लोगों ने नकद राशि के अलावा आभूषण, कपड़े और फर्नीचर जैसी कीमती वस्तुएं दान कीं। इसी दौरान दान में मिली एक मुर्गी द्वारा दिया गया अंडा नीलामी में रखा गया, जिसे स्थानीय निवासी शब्बीर हुसैन ने 25 हजार रुपये की भारी-भरकम राशि देकर खरीदा।

क्यों दिया इतना महंगा दाम? अंडा खरीदने वाले शब्बीर हुसैन ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह राशि अंडे की कीमत के लिए नहीं, बल्कि पीड़ितों के प्रति संवेदना जताने के लिए दी है। उन्होंने कहा, सब जानते हैं कि अंडे की कीमत 10 रुपये है। मैंने 25 हजार इसलिए दिए ताकि ईरान के बच्चों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ अपना विरोध और समर्थन दर्ज करा सकूं। हम अपने समुदाय के साथ मजबूती से खड़े हैं।

बड़ी संख्या में जुटाया जा रहा फंड यह पहली बार नहीं है जब लेह में इस तरह की नीलामी हुई है। इससे पहले भी एक कार्यक्रम में दान में मिला एक मुर्गा 1.25 लाख रुपये में नीलाम हुआ था। वहीं, एक अन्य मौके पर एक अंडा 6 हजार रुपये में बिका था। लगातार हो रही इन नीलामियों से जमा हो रही राशि युद्ध प्रभावितों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

दूतावास और कानूनी प्रक्रिया ईरानी दूतावास ने मार्च 2026 में राहत कार्यों के लिए सहायता की अपील की थी। जिसके बाद देशभर के शिया संगठनों ने सक्रिय भूमिका निभाई। हालांकि, राजनयिक नियमों और भारत के बैंकिंग कानूनों के कारण यह राशि सीधे तेहरान भेजना एक जटिल प्रक्रिया है। वर्तमान में भारतीय नियमों के तहत अलग बैंक खाते के जरिए दान जुटाने की व्यवस्था की गई है।

युद्धविराम की उम्मीदें दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच 45 दिनों के युद्धविराम को लेकर बातचीत चल रही है। इस समझौते को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। लेह के लोगों की यह पहल युद्ध के साये में जी रहे लोगों के लिए एक बड़ी मानवीय उम्मीद बनकर उभरी है।

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