न हीरा न सोना, इस खजाने पर भारत का दांव... 4,000 मील दूर कांगो में क्यों दौड़ा दी बिजली?
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नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर मची हलचल के बीच भारत ने अफ्रीका में एक बड़ा भू-राजनीतिक और आर्थिक दांव खेला है। भारत से करीब 4,000 मील दूर स्थित कांगो में बिजली का संचार करके भारत ने अपनी बढ़ती पहुंच का लोहा मनवाया है। इस पहल के पीछे केवल परोपकार नहीं, बल्कि भविष्य की ग्रीन एनर्जी का बड़ा गेम प्लान भी छिपा है।

काकोबोला हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट का उद्घाटन

भारत सरकार ने लाइन ऑफ क्रेडिट (LOC) के जरिए कांगो में काकोबोला हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट की स्थापना में मदद की है। हाल ही में इसका उद्घाटन कांगो के जल संसाधन और बिजली मंत्री मोलेन्डो साकोम्बी ने किया। यह पावर प्लांट कांगो के क्विलू प्रांत के कस्बों को रोशनी से जगमगाने का काम करेगा।

क्यों महत्वपूर्ण है कांगो का खजाना ?

कांगो को दुनिया का माइनिंग पावर हाउस कहा जाता है। यहां दुनिया का 60 फीसदी से अधिक कोबाल्ट रिजर्व मौजूद है। कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की लिथियम-आयन बैटरियों के लिए सबसे जरूरी धातु है। इसके अलावा, कांगो कॉपर, कोल्टन (मोबाइल फोन में प्रयुक्त) और सोने का भी बड़ा केंद्र है। भारत का वहां निवेश भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने की एक सोची-समझी रणनीति है।

दक्षिण-दक्षिण सहयोग और भारत की बढ़ती चमक

विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह प्रोजेक्ट सतत विकास और स्वच्छ ऊर्जा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। 2014 के बाद से ही फोकस अफ्रीका कार्यक्रम के तहत भारत ने मलावी, मोजांबिक और सियरा लियोन जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। कांगो के साथ भारत का व्यापार 1 बिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है।

सुरक्षा और व्यापार का मजबूत आधार

1962 से ही भारत और कांगो के संबंध ऐतिहासिक और मैत्रीपूर्ण रहे हैं। फिलहाल, कांगो में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना (MONUSCO) के तहत बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक तैनात हैं। वहीं, खनन, आईटी और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों का निवेश कांगो की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है।

क्या है भारत का असल मकसद?

आने वाला समय इलेक्ट्रिक और ग्रीन एनर्जी का है, जिसके लिए कोबाल्ट और कॉपर जैसे खनिजों की मांग बढ़ेगी। कांगो के साथ घनिष्ठ संबंध बनाकर भारत न केवल वहां के बाजार में अपनी जगह मजबूत कर रहा है, बल्कि भविष्य के लिए रणनीतिक धातुओं की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में भी अपनी पकड़ बना रहा है। यह निवेश आने वाले दशकों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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