राघव चड्ढा बनाम आम आदमी पार्टी: क्या केजरीवाल के साथ बढ़ती दूरियों ने खत्म कर दिया युवा नेता का राजनीतिक कद?
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आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर चल रहा घमासान अब सतह पर आ गया है। पार्टी के चमकते सितारे रहे राघव चड्ढा अब नेतृत्व के निशाने पर हैं। उन्हें राज्यसभा के उप-नेता पद से हटाए जाने के बाद से ही कयासों का दौर तेज है कि क्या पार्टी और राघव के बीच सब कुछ खत्म हो चुका है?

पार्टी लाइन से भटकने का आरोप AAP का आरोप है कि राघव चड्ढा पार्टी की आक्रामक नीति से अलग नरम रुख अपना रहे हैं। जब पार्टी केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर रही थी, तब राघव की विदेश यात्राओं को अनुशासनहीनता माना गया। केजरीवाल का स्पष्ट मानना है कि जेल जाने से नहीं डरना चाहिए, लेकिन आरोप है कि राघव ने सुरक्षा और समझौते का रास्ता चुन लिया है।

संसद में सॉफ्ट मुद्दों पर विवाद राघव चड्ढा ने हाल ही में संसद में एयरपोर्ट पर महंगे समोसे, पेटरनिटी लीव, ट्रैफिक जाम और गिग वर्कर्स जैसे मुद्दे उठाए थे। पार्टी नेतृत्व का तर्क है कि ये मुद्दे पीआर (PR) स्टंट की तरह हैं, जो पार्टी के मुख्य विमर्श से ध्यान भटकाते हैं। वहीं, समर्थकों का मानना है कि ये मुद्दे आम आदमी के दैनिक जीवन से सीधे जुड़े हैं।

खामोश किया गया, हारा नहीं : राघव का पलटवार पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने दो टूक कहा, मुझे खामोश करने की कोशिश की गई है, लेकिन मैं हारने वाला नहीं हूं। उन्होंने सीधे सवाल किया कि आम आदमी से जुड़े मुद्दे उठाने पर उन्हें सजा क्यों दी जा रही है? यह बयान स्पष्ट करता है कि वे पार्टी नेतृत्व के फैसले से आहत और असहमत हैं।

क्या पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएंगे केजरीवाल? आम आदमी पार्टी का इतिहास रहा है कि जब भी किसी नेता की छवि पार्टी के मुख्य नेतृत्व (केजरीवाल) से बड़ी होने लगती है, उसे किनारा कर दिया जाता है। कुमार विश्वास, योगेंद्र यादव और स्वाति मालीवाल जैसे पूर्व उदाहरण इस बात की तस्दीक करते हैं।

राघव चड्ढा की युवा लोकप्रियता और उनकी क्लीन इमेज अब शायद उनके लिए ही मुसीबत बन गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राघव का पार्टी से निष्कासन अब केवल समय की बात है, क्योंकि केजरीवाल की कार्यशैली में सीधे संवाद से ज्यादा पार्टी अनुशासन का महत्व है।

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