क्या भारत का विकास सिर्फ अमीरों के लिए? दो दिग्गज अर्थशास्त्रियों के बीच डेटा वॉर
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भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा को लेकर दो बड़े अर्थशास्त्रियों के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक तीखी बहस छिड़ी है। विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के बीच हुआ यह वैचारिक टकराव अब चर्चा का विषय बन गया है।

कौशिक बसु की चिंता: बेरोजगारी है समस्या

बहस की शुरुआत कौशिक बसु के एक ट्वीट से हुई। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि देश में विकास का लाभ केवल अमीरों तक सीमित रह गया है।

बसु ने 15.6 प्रतिशत की उच्च युवा बेरोजगारी दर का हवाला दिया और लिखा, विकास का लाभ केवल अमीरों को मिल रहा है। रुपया कमजोर हो रहा है और नीतियों पर राजनीति हावी हो रही है। उन्होंने इसे देश की संभावनाओं के लिए दुखद बताया।

अरविंद पनगढ़िया का डेटा से पलटवार

कौशिक बसु के आरोपों का जवाब देने के लिए अरविंद पनगढ़िया ने आंकड़ों की एक मजबूत ढाल पेश की। उन्होंने इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) के लेख का हवाला देते हुए एक विस्तृत तालिका साझा की।

पनगढ़िया ने बसु को संबोधित करते हुए कहा, आपको यह भरोसा दिलाने के लिए कि विकास केवल अमीरों को समृद्ध नहीं कर रहा है, ये गरीबी के आंकड़े देखें। उन्होंने साफ किया कि गरीबी के मोर्चे पर भारत ने बड़ी सफलता हासिल की है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

पनगढ़िया द्वारा साझा की गई तालिका के अनुसार, गरीबी में ऐतिहासिक गिरावट आई है:

पनगढ़िया के अनुसार, इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम पायदान तक पहुंचा है। उन्होंने घरेलू उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (HCES) के आधार पर यह तर्क दिया कि गरीब तबका तेजी से गरीबी रेखा से बाहर निकला है।

तेंदुलकर गरीबी रेखा क्या है?

इस पूरी बहस का केंद्र तेंदुलकर गरीबी रेखा (TPL) है। सुरेश तेंदुलकर समिति ने 2009 में गरीबी मापने के लिए एक नई पद्धति सुझाई थी। यह समिति केवल कैलोरी की खपत को ही पैमाना नहीं मानती, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जीवन के महत्वपूर्ण मानकों को भी गरीबी के आकलन में शामिल करती है।

फिलहाल, इस डेटा वॉर ने यह बहस तेज कर दी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर क्या है—बेरोजगारी की चुनौतियां या गरीबी उन्मूलन की सफलता।

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