ईरान की वॉर स्ट्रैटेजी ने अमेरिका और इसराइल के समीकरण बिगाड़े
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28 फरवरी को जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान के खिलाफ साझा सैन्य अभियान शुरू किया था, तब कयास लगाए जा रहे थे कि यह युद्ध कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा। लेकिन एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है और युद्ध के थमने के कोई आसार नहीं हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दो या तीन हफ़्तों में वापसी का संकेत दिया है, जो यह दर्शाता है कि यह जंग अमेरिका की उम्मीदों के विपरीत दिशा में जा रही है।

ईरान का लचीलापन और चौतरफा दबाव

शुरुआती नुकसान के बावजूद ईरान युद्ध में डटा हुआ है। उसने न केवल खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, बल्कि होर्मुज़ स्ट्रेट को भी बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल संकट पैदा हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि खाड़ी देशों का अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा कम हुआ है। वहीं, अमेरिका अपने सहयोगी देशों—ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी—के ढुलमुल रवैये से नाराज है और उन पर युद्ध में सक्रिय सहयोग न देने का आरोप लगा रहा है।

डिप्लोमेसी और कूटनीति में ट्रंप की चुनौती

रणनीतिक मामलों के जानकार हैप्पीमोन जैकब के मुताबिक, ट्रंप का व्यक्तित्व और उनकी कूटनीतिक शैली इस युद्ध में एक बड़ी बाधा बनी है। ट्रंप द्वारा बातचीत को धोखे के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना और सहयोगी देशों पर दबाव बनाना उल्टा पड़ गया है। दूसरी ओर, इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की घरेलू राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी युद्ध को तार्किक अंत तक ले जाने में बाधक बन रही हैं।

थकाने वाली रणनीति और ईरान का यू-टर्न

ईरान ने इस युद्ध को केवल द्विपक्षीय संघर्ष नहीं, बल्कि एक मल्टी-थिएटर टकराव में बदल दिया है। लेबनान, इराक और खाड़ी देशों से हो रहे हमलों ने अमेरिका और इसराइल के सैन्य संसाधनों को कई दिशाओं में बिखेर दिया है। ईरानी विशेषज्ञ हमीद्रेज़ा अज़ीज़ी का कहना है कि ईरान की रणनीति जीत की नहीं, बल्कि अपने विरोधियों को थकाने (Attritional Warfare) की है।

क्या ट्रंप बैकफुट पर हैं?

ब्रह्मा चेलानी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का शासन पलटने का दावा फेल हो चुका है। ईरान के साथ सकारात्मक बातचीत की ट्रंप की हालिया पहल, ज़मीनी हकीकत से मजबूर होकर लिया गया एक यू-टर्न है। इसके अलावा, ईरान ने सत्ता के विकेंद्रीकरण और सैन्य स्वायत्तता के जरिए खुद को नेतृत्व के नुकसान के बावजूद सुरक्षित और सक्रिय रखा है।

वैश्विक अलगाव और ईरान के प्रति सहानुभूति

एक प्राइमरी स्कूल पर हुए हमले में बड़ी संख्या में लड़कियों की मौत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और इसराइल को अलग-थलग कर दिया है। न केवल वैश्विक स्तर पर आलोचना बढ़ रही है, बल्कि खुद अमेरिका के भीतर भी युद्ध विरोधी प्रदर्शन तेज हो गए हैं। होर्मुज़ स्ट्रेट पर ईरान की सख्ती के बावजूद चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों का रुख इसराइल-अमेरिका के लिए असहज करने वाला है।

कुल मिलाकर, एक महीने से अधिक चली यह जंग इस बात का प्रमाण है कि ईरान ने अपनी युद्धनीति और कूटनीतिक चालों से अमेरिका की पूर्ण जीत के दावों को गंभीर चुनौती दी है। ट्रंप की चेतावनी और धमकियों के बीच, यह युद्ध अब एक ऐसी अनिश्चितता में बदल चुका है, जहां दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल संकट और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है।

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