पुतिन का एनर्जी वार : पेट्रोल निर्यात पर 4 महीने की रोक से ड्रैगन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार थमी
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मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते संकट के बीच रूस ने एक ऐसा फैसला लिया है जिससे चीन की चिंताएं बढ़ गई हैं। रूस ने 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक गैसोलिन (पेट्रोल) के निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। मॉस्को का कहना है कि यह कदम घरेलू मांग को पूरा करने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए उठाया गया है।

चीन के लिए बढ़ा बड़ा खतरा रूस के इस फैसले का सबसे बुरा असर चीन पर पड़ने वाला है। चीन रूसी गैसोलिन का सबसे बड़ा आयातक देश है। बीजिंग रूस से रोजाना करीब 1.2 से 1.7 लाख बैरल पेट्रोल मंगाता है। केवल पिछले साल दिसंबर में चीन ने रूस से करीब 65,000 करोड़ रुपये का पेट्रोल खरीदा था। अब 4 महीने तक सप्लाई बंद होने से चीन को तत्काल तेल का नया विकल्प ढूंढना होगा, जो वैश्विक बाजार की मौजूदा स्थिति में बेहद मुश्किल है।

चीन में महंगाई और मंदी का दोहरा संकट चीन पहले ही रियल एस्टेट और बैंकिंग सेक्टर में सुस्ती से जूझ रहा है। युद्ध के कारण चीन में हाल ही में पेट्रोल-डीजल की कीमतें पहले ही बढ़ाई जा चुकी हैं। अब रूस से सप्लाई रुकने के बाद वहां पेट्रोल और डीजल की कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की बढ़ती कीमतें चीन में महंगाई को और अधिक भड़काएंगी, जिससे मंद पड़ती अर्थव्यवस्था के लिए हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएंगे।

क्या भारत पर भी पड़ेगा असर? जहां पूरी दुनिया ऊर्जा संकट की आहट से डरी हुई है, वहीं भारत के लिए राहत की बात है। भारत अपनी जरूरत के लिए सीधे पेट्रोल आयात करने के बजाय कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) आयात करता है और उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है। भारत के कुल रूसी आयात में तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी केवल 5-7 फीसदी है। इसलिए, पेट्रोल निर्यात पर लगे इस बैन से भारत की घरेलू आपूर्ति पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

अस्थिर होता एनर्जी मार्केट यह पहली बार नहीं है जब रूस ने पेट्रोल निर्यात पर बैन लगाया है, लेकिन इस बार का समय बेहद संवेदनशील है। खाड़ी देशों की रिफाइनरियों पर मंडराते खतरों के बीच रूस का यह फैसला कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में और उछाल ला सकता है। चीन के लिए यह झटका सिर्फ सप्लाई का नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन का भी है, क्योंकि पहले भी रूस के कई तेल जहाज चीन के बजाय भारत की ओर रुख कर चुके हैं। अब ऊर्जा संकट के बीच चीन का भविष्य रूसी तेल की अनिश्चितता पर टिक गया है।

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