बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की कार्यशैली हमेशा से संकेतों और प्रतीकों की रही है। लेकिन मुख्यमंत्री के इन प्रतीकों के पीछे एक डरावना ट्रेंड भी छिपा है। अक्सर देखा गया है कि नीतीश कुमार ने जिसे भी अपना वारिस या उत्तराधिकारी बताया, उसका राजनीतिक करियर या तो हाशिए पर चला गया या वह पार्टी से बाहर हो गया।
प्रशांत किशोर से ललन सिंह तक: लंबी है लिस्ट नीतीश कुमार का आशीर्वाद पाने वाले नेताओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है। प्रशांत किशोर कभी नीतीश के सबसे भरोसेमंद सेकेंड मैन थे और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक बने, लेकिन आज वे पार्टी से अलग अपनी राह तलाश रहे हैं। वहीं, आरसीपी सिंह, जिन्हें कभी नीतीश का उत्तराधिकारी माना जाता था, वे भी आज गुमनामी के अंधेरे में हैं। ललन सिंह जैसे कद्दावर नेता, जिन्हें पार्टी की कमान सौंपी गई थी, उन्हें भी अंततः हटना पड़ा।
मनीष वर्मा और संजय झा भी रहे चर्चा में इस लिस्ट में मनीष वर्मा और संजय झा जैसे नाम भी शामिल हैं। कभी इन्हें नेक्स्ट टू नीतीश कहा जाता था और विश्लेषक कयास लगाते थे कि नीतीश अपनी विरासत इन्हें सौंपेंगे। आज ये नेता भी मुख्य फोकस से बाहर हैं, और सारा केंद्र बिंदु केवल नीतीश कुमार ही बने हुए हैं।
क्या सम्राट चौधरी के लिए ग्रहण बनेगा यह हाथ? अब नीतीश कुमार ने बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के कंधे पर अपना हाथ रखा है और सार्वजनिक मंचों से उन्हें उत्तराधिकारी के रूप में संकेत दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश का यह हाथ आशीर्वाद से ज्यादा सियासी ग्रहण साबित होता रहा है। तेजस्वी यादव के साथ भी ऐसा ही हुआ था, जब नीतीश ने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा था कि अब यही लोग आगे देखेंगे , लेकिन इसके बाद तेजस्वी की राजनीति का ग्राफ गिर गया।
बीजेपी के लिए क्यों असहज है यह प्रोजेक्शन ? नीतीश कुमार का सम्राट चौधरी को बार-बार मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना बीजेपी के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर रहा है। बीजेपी सेंट्रलाइज्ड पार्टी है और वह अपने फैसले चौंकाने वाले तरीके से लेती है। ऐसे में नीतीश का अत्यधिक समर्थन सम्राट चौधरी के लिए फायदे के बजाय नुकसान का कारण बन सकता है, क्योंकि बीजेपी में किसी चेहरे को अति-प्रोजेक्ट करना अक्सर पार्टी की रणनीति के खिलाफ होता है।
सामने हैं बड़ी चुनौतियां सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी बाधा उनकी छवि आयातित नेता की है। वे राजद और जदयू के रास्ते बीजेपी तक पहुंचे हैं, जिसके कारण संघ के पुराने कार्यकर्ता उन्हें पूरी तरह स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं। हालांकि सम्राट ने पार्टी के साथ खुद को ढाला है, लेकिन क्या वे नीतीश के इस सियासी स्पर्श के बाद खुद को सुरक्षित रख पाएंगे? यह आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतिहास तो यही कहता है कि नीतीश का साथ मिलना कभी भी भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं रहा है।
*नालंदा: प्रशांत किशोर का परिवारवाद पर बड़ा हमला. निशांत की राजनीति में एंट्री पर कहा - अब नेताओं के बेटे राज करेंगे. बिहार के बच्चे मजदूरी को मजबूर. नीतीश कुमार पर भी निशाना साधते हुए कहा- चुनाव पैसे और सिस्टम से प्रभावित. वोट खरीदे गए. इसी वजह से नतीजे बदले.#BiharPolitics #PK… pic.twitter.com/r8V7ykiWz9
— Prabhat Khabar (@prabhatkhabar) March 19, 2026
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