ईरान-इजरायल जंग की आंच में झुलसी मोरबी की टाइल्स इंडस्ट्री, थम गया उत्पादन और पलायन को मजबूर मजदूर
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ईंधन का गहराता संकट ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव ने सीधे तौर पर भारत के सबसे बड़े सिरेमिक हब मोरबी को अपनी चपेट में ले लिया है। युद्ध के कारण नेचुरल और प्रोपेन गैस की सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो गई है। गैस की भारी किल्लत और आसमान छूती कीमतों के चलते मोरबी में 400 से अधिक सिरेमिक फैक्ट्रियों ने अपने भट्टों (Kilns) को ठंडा रखने का फैसला किया है।

घाटे का सौदा बना उत्पादन मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष निलेश जेतपरिया के अनुसार, गैस की अनियमित आपूर्ति और अनिश्चित बाजार ने पूरे उद्योग का गणित बिगाड़ दिया है। उद्योगपतियों का कहना है कि वर्तमान कीमतों पर गैस खरीदकर उत्पादन करना घाटे का सौदा है। इस स्थिति को देखते हुए, उद्योगपतियों ने स्वेच्छा से कम से कम एक महीने के लिए उत्पादन बंद रखने का कड़ा फैसला लिया है।

लॉजिस्टिक्स की मार और विदेशी खरीदारों की दूरी युद्ध का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर वॉर चार्ज (युद्ध शुल्क) बढ़ने से लॉजिस्टिक्स की लागत कई गुना बढ़ गई है। इसका सीधा असर निर्यात पर पड़ा है और विदेशी खरीदारों ने माल उठाने से हाथ खींच लिए हैं। चिंताजनक बात यह है कि टाइल्स से भरे कई कंटेनर बंदरगाहों से वापस लौटने लगे हैं, जिससे करोड़ों रुपये के आर्थिक नुकसान का खतरा पैदा हो गया है।

मजदूरों का पलायन: सूने पड़े कारखाने फैक्ट्रियां बंद होने का सबसे बुरा असर उन हजारों मजदूरों पर पड़ा है, जिनकी आजीविका इन मशीनों पर निर्भर थी। काम बंद होने के बाद, अब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूर अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं। मोरबी के रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर भारी भीड़ देखी जा रही है। श्रमिक किसी भी तरह घर पहुंचने की जद्दोजहद में हैं।

कुशल श्रम की कमी का डर उद्योगपति केजी कुंडारिया ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो यह संकट भविष्य में और गहरा सकता है। उन्होंने कहा कि एक बार जब मजदूर अपने राज्यों में लौट जाएंगे, तो भविष्य में फैक्ट्रियां दोबारा शुरू करने पर कुशल श्रम (Skilled Labor) की कमी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरेगी। फिलहाल, पूरा सिरेमिक हब अनिश्चितता की गहरी धुंध में डूबा हुआ है।

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