साइना नेहवाल: बिना फिजियो-ट्रेनर के बनीं बैडमिंटन की आइकन , संघर्ष की अनसुनी दास्तां
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नई दिल्ली: भारतीय बैडमिंटन की स्टार और ओलंपिक पदक विजेता साइना नेहवाल को नई दिल्ली में आयोजित वर्ल्ड पल्स समिट में आइकन अवॉर्ड से नवाजा गया। यह सम्मान उनके उस सुनहरे सफर को समर्पित है, जिसमें उन्होंने न केवल कई रिकॉर्ड तोड़े, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के लिए प्रेरणा भी बनीं।

नंबर-1 बनने वाली पहली भारतीय महिला साइना नेहवाल का करियर उपलब्धियों से भरा रहा है। 2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतना हो या 2015 में विश्व की नंबर-1 खिलाड़ी बनना, साइना ने कई कीर्तिमान स्थापित किए। वह BWF के हर बड़े व्यक्तिगत टूर्नामेंट में पदक जीतने वाली इकलौती भारतीय खिलाड़ी हैं।

मां का सपना, साइना की हकीकत समिट के दौरान साइना ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां को दिया। उन्होंने याद करते हुए कहा कि एक ऐसा दौर था जब बैडमिंटन में उनके पास घर में कोई महिला रोल मॉडल नहीं थी। तब उनकी मां ने ही उन्हें बार-बार याद दिलाया कि वे एक दिन ओलंपियन और वर्ल्ड चैंपियन बनेंगी। खुद साइना को शुरुआती दिनों में अपनी मां की बातों पर यकीन नहीं होता था, लेकिन संकल्प और कड़ी मेहनत ने इसे सच कर दिखाया।

संसाधनों का अभाव और संघर्षपूर्ण शुरुआत साइना ने अपने शुरुआती दिनों के कठिन दौर को याद करते हुए बताया कि आज के आधुनिक दौर की तरह तब सुविधाएं नहीं थीं। उन्होंने कहा, उस समय मेरे पास कोई समर्पित ट्रेनर या फिजियो नहीं था। मैंने जो भी किया, वह मेरी मां और पुलेला गोपीचंद सर के मार्गदर्शन में हुआ। उन्होंने आगे कहा कि कोई महिला प्रेरणा न होने की वजह से वह प्रकाश पादुकोण को अपना आदर्श मानकर आगे बढ़ीं।

भारत को ओलंपिक मेजवानी के लिए तैयार देखना चाहती हैं साइना बैडमिंटन की लोकप्रियता पर बात करते हुए साइना ने कहा कि क्रिकेट के बाद आज बैडमिंटन देश का दूसरा सबसे पसंदीदा खेल बन गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी करेगा और उस दौरान बैडमिंटन में सबसे ज्यादा पदक जीतने का लक्ष्य रखेगा।

साइना का यह सफर उन सभी युवा खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल है जो सुविधाओं की कमी का बहाना बनाते हैं। बिना फिजियो और बिना बड़े सेटअप के विश्व पटल पर भारत का नाम रोशन करने वाली साइना आज वाकई खेल जगत की एक सच्ची आइकन हैं।

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