जापान की गुड़िया ने बढ़ाई ट्रंप की टेंशन! डील, डॉल और डिप्लोमेसी का DNA टेस्ट
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जापान दौरे के बीच, अमेरिका के साथ टैरिफ तनाव बढ़ गया है। जापान, भारत का मित्र देश है, और पीएम को दिए गए एक उपहार - एक डरुमा डॉल - ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए नई चिंताएँ पैदा कर दी हैं।

टोक्यो के डरुमा जी मंदिर में, मंदिर के पुजारी ने पीएम मोदी को यह गुड़िया भेंट की। जापानी भाषा में इसे डरुमा डॉल कहते हैं। मान्यता है कि यह गुड़िया मन्नत पूरी करने से जुड़ी है।

इस डॉल की दोनों आंखें सफेद होती हैं। मन्नत मांगते समय दाईं आंख पर रंग लगाया जाता है, और मन्नत पूरी होने तक इसे ऐसी जगह रखा जाता है, जहां से इसे रोजाना देखा जा सके। मन्नत पूरी होने पर बाईं आंख पर रंग लगाया जाता है। जापान में मान्यता है कि डरुमा डॉल से मन्नत पूरी होने के बाद जीवन सुख समृद्धि से भर जाता है।

भारत और जापान ट्रंप के सख्त टैरिफ से निपटने का समाधान चाहते हैं। अमेरिका ने भारत पर 50% और जापान के उत्पादों पर 24% तक टैरिफ लगाया है। जापान से निर्यात होने वाले स्टील और एल्यूमीनियम पर यह टैरिफ 50% तक है।

ट्रंप ने जापान की कंपनियों से अमेरिका में 550 बिलियन डॉलर का निवेश करने को कहा था, लेकिन जापान ने 29 अगस्त को यह यात्रा रद्द कर दी, जिससे संकेत मिलता है कि वह ट्रंप की दादागिरी के आगे नहीं झुकेगा।

भारत की तरह जापान ने भी ट्रंप के टैरिफ का जवाब दिया है, जिससे दक्षिण और पूर्वी एशिया में एक मजबूत आर्थिक गठबंधन की संभावना बढ़ गई है। भारत के गहनों का 30% निर्यात अमेरिका को होता है, जबकि जापान को 0.75%। जापानी गाड़ियों का 36% निर्यात अमेरिका जाता है, जबकि भारत को 0.20%। यदि जापान चाहे तो उसे अमेरिका के विकल्प के तौर पर भारतीय बाजार मिल सकता है।

जापान ने अमेरिका में 550 बिलियन डॉलर के निवेश को टाल दिया, लेकिन भारत में 10 ट्रिलियन येन (लगभग 60 हजार करोड़) के निवेश का आश्वासन दिया है।

इस डरुमा डॉल का भारत से सदियों पुराना रिश्ता है, जिसकी बुनियाद बौद्ध संत बोधिधर्म हैं। बोधिधर्म 5वीं और 6वीं शताब्दी के बीच चीन और जापान गए थे, जहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की एक शाखा की स्थापना की थी। जापानी भाषा में बोधिधर्म को ही डरुमा जी कहा जाता है।

मान्यताओं के मुताबिक संत बोधिधर्म जीवन में 8 के नियम का पालन करने के लिए कहते थे: अगर जीवन में सात बार भी असफल हो जाओ, तब भी आठवीं बार खड़े होकर दोबारा प्रयास करना चाहिए।

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से त्रस्त देश दुनिया के अर्थ-तंत्र से अमेरिका का दबदबा कम करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत और जापान ऐसा ही प्रयास कर रहे हैं।

ब्रिक्स (भारत, रूस और चीन समेत 11 देशों का गठबंधन) ने अमेरिकी टैरिफ का पुरजोर विरोध किया है। भारत और ब्राजील पर ट्रंप ने 50% का टैरिफ लगाया है। चीन पर 145% और रूस पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी दी है। इन कदमों के पीछे ब्रिक्स की दहशत मानी जा रही है।

ब्राजील में हुई ब्रिक्स समिट में सदस्यों ने अपनी आर्थिक मदद के लिए संस्था बनाने, आपसी व्यापार बढ़ाने और अपनी करेंसी में व्यापार करने पर सहमति जताई थी। इसी करेंसी में व्यापार करने का प्लान ट्रंप के लिए सिरदर्द बना हुआ है।

आज अंतरराष्ट्रीय लेनदेन का 80 से 90% हिस्सा डॉलर आधारित है। यदि ब्रिक्स सदस्यों ने अपनी करेंसी में व्यापार किया तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की अहमियत कम हो जाएगी, जिससे अमेरिका का व्यापारिक घाटा 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

वर्ष 2023 में सऊदी अरब समेत कुछ तेल उत्पादक देशों ने डॉलर की जगह दूसरी करेंसी में व्यापार किया। जानकारों का मानना है कि अगले 10 सालों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की दखल सिर्फ 50% तक रह जाएगी।

इसी वजह से डॉलर का दबदबा बनाए रखने के लिए ट्रंप ने टैरिफ को हथियार बनाया। एक अमेरिकी थिंक टैंक ने अनुमान लगाया है कि टैरिफ लागू होने के बाद अमेरिका में आयात होने वाले उत्पादों की खुदरा बाजार में कीमत 2.3 से 2.7% तक बढ़ गई है, जिससे एक आम अमेरिकी परिवार पर सालाना लगभग 1 लाख 23 हजार रुपए का अतिरिक्त भार पड़ रहा है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जिस उछाल का दावा ट्रंप कर रहे हैं, शायद वो कभी आएगा ही नहीं। भारत, जापान और चीन जैसे देशों ने इसे समझ लिया है और वे डटकर ट्रंप के इस टैरिफ का मुकाबला करने के लिए तैयार खड़े हैं।

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