पटना में नेताओं का लट्ठ युद्ध : भाजपा जीती या कांग्रेस?
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पटना में आज, दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच जमकर लाठी-डंडे चले। यह घटना गौतम बुद्ध की भविष्यवाणी को सच साबित करती दिखी, जिन्होंने कहा था कि पाटलिपुत्र (पटना) आर्यावर्त का सबसे अच्छा नगर होगा, लेकिन यहां आग, पानी और आंतरिक मतभेद का डर हमेशा बना रहेगा।

यह लट्ठ युद्ध तब शुरू हुआ जब बीजेपी कार्यकर्ता दरभंगा में कांग्रेस के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित अपशब्दों के विरोध में कांग्रेस के कार्यालय सदाकत आश्रम में प्रदर्शन करने पहुंचे।

बिहार सरकार के मंत्री नितिन नवीन और संजय सरावगी के नेतृत्व में बीजेपी कार्यकर्ता झंडे लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। कांग्रेस कार्यकर्ता भी अपने पार्टी के झंडे लेकर कार्यालय के बाहर खड़े थे। जल्द ही, दोनों दलों के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए और प्रदर्शन लाठी-डंडों में बदल गया। ईंट और पत्थर भी फेंके गए, जिससे माहौल हिंसक हो गया।

आश्चर्यजनक बात यह रही कि पटना पुलिस, जो लाठीचार्ज के लिए जानी जाती है, ने एक बार भी लाठी का इस्तेमाल नहीं किया।

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जबरदस्ती लोहे के गेट को तोड़कर कार्यालय में प्रवेश किया और वहां खड़ी गाड़ियों में तोड़फोड़ की। बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस कार्यालय से ईंट-पत्थर फेंके गए थे।

इस बीच, एक वीडियो में बीजेपी के एक कार्यकर्ता को अकेले ही चारों तरफ लाठी भांजते हुए देखा गया।

हिंसा के दौरान, दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने अपने ही पार्टी के झंडे का अपमान किया, उन्हें जमीन पर फेंक दिया।

इस लड़ाई में दोनों पार्टियों के 20 से ज्यादा कार्यकर्ता घायल हुए हैं।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस घटना पर बीजेपी पर निशाना साधा और कहा कि सत्य और अहिंसा के आगे असत्य और हिंसा नहीं टिक सकते। वहीं, गृह मंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी पर हमला बोलते हुए कहा कि बीजेपी प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्दों से नाराज है।

इस मामले में दरभंगा पुलिस ने गाली देने के आरोपी रिजवी उर्फ राजा को गिरफ्तार किया है।

यह घटना 22 साल पहले 2003 में लालू प्रसाद यादव की तेल पिलावन लाठी घुमावन रैली की याद दिलाती है, जिसे उनके विरोधी जंगलराज के प्रतीक के रूप में याद करते हैं।

भारत में लाठी का ऐतिहासिक महत्व रहा है, जो न्याय, विरोध और सत्ता का प्रतिनिधित्व करती रही है।

लेकिन, आज पटना की सड़कों पर छिड़ी लाठी-डंडे की लड़ाई यह सवाल खड़ा करती है कि क्या बिहार का चुनाव इसी तरह लड़ा जाएगा? क्या जनता से जुड़े मुद्दों की गूंज सुनाई नहीं देगी? क्या लाठी-डंडों के शोर में जनता के बुनियादी मुद्दों को भुला दिया जाएगा?

बिहार में चुनावों के दौरान हिंसा का इतिहास रहा है। 90 के दशक में हेमंत शाही, अजीत सरकार, देवेंद्र दुबे और बृजबिहारी प्रसाद जैसे विधायकों की हत्या हुई थी।

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