चीन में खान-पान की आदतों में बदलाव के कारण भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। चीन में पंख वाले पक्षियों (बत्तख और हंस) को खाने की प्रवृत्ति कम होने से शटलकॉक के लिए पंखों की कमी हो गई है। इससे शटलकॉक की कीमतें 150 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।
इस संकट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुलेला गोपीचंद की हैदराबाद स्थित अकादमी में, जिसने देश को कई शीर्ष खिलाड़ी दिए हैं, अब मुश्किल से दो हफ्ते का स्टॉक बचा है। 2023 में पांच शटलकॉक का एक पैकेट 1200 रुपये में मिलता था, अब इसकी कीमत 3000 रुपये तक पहुंच गई है।
2022 में पोर्क (सूअर का मांस) की कीमतों में करीब 50 फीसदी की गिरावट आई। यह 330 रुपये प्रति किलो से घटकर 176 रुपये प्रति किलो रह गया। इससे उपभोक्ताओं की मांग बत्तख और हंस से हटकर पोर्क की ओर बढ़ गई।
कीमतों के इस बदलाव ने चीन के पशुपालकों को भी प्रभावित किया। वे अब सुअर पालने लगे हैं, क्योंकि सुअर जल्दी बड़े होते हैं और ज्यादा मुनाफा देते हैं, जबकि बत्तख और हंस पालने में ज्यादा समय और जगह की जरूरत होती है।
आंकड़ों के अनुसार, 2019 में चीन में 487 करोड़ से ज्यादा बत्तख और 63 करोड़ से ज्यादा हंस मारे गए थे, जबकि 2023 में यह घटकर 421 करोड़ बत्तख और 51 करोड़ हंस रह गए। यहीं से समस्या शुरू हुई।
सामान्य शटलकॉक बत्तख के पंखों से बनती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल होने वाली उच्च गुणवत्ता वाली शटल में हंस के पंख लगाए जाते हैं। चीन की फैक्ट्रियों में ये पंख मांस उपयोग के बाद ही निकाले जाते हैं। पोर्क के मुकाबले कम बत्तख और हंस पाले जाने की वजह से शटल का उत्पादन भी कम हो गया है।
दुनिया की 90 फीसदी शटलकॉक चीन में बनती हैं। एक शटल बनाने के लिए 16 पंखों की जरूरत होती है और एक मैच में दर्जनों शटल खत्म हो जाती हैं। इस बीच दुनिया भर में बैडमिंटन की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है।
शटलकॉक की कमी सिर्फ बत्तखों या हंसों की कमी के कारण ही नहीं है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि पहले की तुलना में अब ज्यादा लोग बैडमिंटन खेल रहे हैं। चीन, भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों में ओलंपिक, थॉमस कप और BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसे आयोजनों ने खेल की मांग को और बढ़ा दिया है। भारत ही नहीं, डेनमार्क और फ्रांस जैसे देश भी इस समस्या से जूझ रहे हैं।
जापानी कंपनी योनेक्स, जो चीन में शटलकॉक का उत्पादन करती है, का कहना है कि मांग इतनी ज्यादा है कि कंपनी उत्पादन नहीं कर पा रही है। यह संकट खेल की जड़ों को हिला सकता है।
शटल की कमी के संकट को देखते हुए बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (BWF) ने अब प्लास्टिक या सिंथेटिक शटल पर एक बार फिर विचार करना शुरू किया है। फ्रांस का बैडमिंटन संघ जूनियर स्तर की प्रतियोगिताओं में वैकल्पिक शटल इस्तेमाल करने पर विचार कर रहा है।
कुछ कंपनियां हाइब्रिड शटल बना रही हैं, जो आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से कृत्रिम होती हैं। ये शटल महंगी हैं और उतनी टिकाऊ नहीं हैं जितनी कि पारंपरिक शटल होती हैं। कृत्रिम शटल अपनी दिशा जल्दी बदल लेती हैं, जिससे खिलाड़ियों के लिए उनकी गति और दिशा पर काबू पाना मुश्किल होता है।
बढ़ती हुई कीमतों में राहत देने के लिए इंपोर्ट ड्यूटी और जीएसटी में कमी करने और सब्सिडी देने का एक उपाय हो सकता है, लेकिन यह दूरगामी उपाय नहीं माना जा सकता। शटलकॉक उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है। भारत में केरल और पश्चिम बंगाल में कुछ प्रोडक्शन यूनिट्स हैं, लेकिन प्रोडक्शन के साइज और क्वालिटी के मामले में ये चीनी आयातों से प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में नहीं हैं।
भारत के आईआईटी जैसे संस्थान वैकल्पिक उत्पाद तैयार कर सकते हैं। बर्ड फ्लू ने भी शटलकॉक के उत्पादन पर असर डाला था। इसलिए जितनी जल्दी हो सके रास्ता निकालना जरूरी है, वरना भारत में बैडमिंटन का फ्यूचर खतरे में पड़ जाएगा।
#DNAWithRahulSinha | बैडमिंटन की चिड़िया के पंख हो रहे फुर्रर्र! शटल की कमी के संकट से निपटें कैसे?#DNA #Shuttlecock #China #Badminton @RahulSinhaTV pic.twitter.com/3eRmzPRNyG
— Zee News (@ZeeNews) August 28, 2025
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