मच्छरों, भीषण गर्मी और 44 घंटे के सफर के बीच तन्वी पात्री की गोल्डन जिद
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बैडमिंटन खिलाड़ी तन्वी पात्री ने यूथ ओलंपिक्स में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। लेकिन इस चमकती सफलता के पीछे किसी फिल्म जैसी कहानी नहीं, बल्कि भीषण संघर्ष और प्रतिकूल परिस्थितियों की एक लंबी दास्तान है। उनके पिता रबिनारायण पात्री ने उन चुनौतियों का खुलासा किया है, जिनसे जूझकर तन्वी ने यह मुकाम हासिल किया।

44 घंटे का थका देने वाला सफर तन्वी के लिए चुनौतियों की शुरुआत डकार पहुँचने से पहले ही हो गई थी। रबिनारायण बताते हैं कि वर्ल्ड जूनियर्स के लिए 28 घंटे और यूथ ओलंपिक्स के लिए उन्हें कुल 44 घंटे की यात्रा करनी पड़ी। दस्तावेजों की समस्या और प्रशासनिक देरी के कारण तन्वी को घंटों एयरपोर्ट पर बिना भोजन-पानी के गुजारना पड़ा, जिससे वे डिहाइड्रेशन और बुखार की चपेट में आ गईं।

मच्छर और बिना AC के कमरे खेलों के दौरान हालात और कठिन थे। डकार में तन्वी को जिन कमरों में रुकना पड़ा, वहाँ न तो एसी की सुविधा थी और न ही मच्छरों से मुक्ति। हालात इतने खराब थे कि गेम्स विलेज से उनकी चादरें और कंबल तक चोरी हो गए। बावजूद इसके, तन्वी ने अपना ध्यान खेल से नहीं भटकने दिया।

परीक्षा में फेल हो जाओ तो भी चलेगा तन्वी की परवरिश पर बात करते हुए उनके पिता का नज़रिया बिल्कुल अलग है। वे कहते हैं, यह जेनरेशन अल्फा है। अगर आप तन्वी से सुबह 5 बजे उठने की उम्मीद करेंगे तो वह चिढ़ जाएगी। मैं उसे 9 बजे तक सोने देता हूँ ताकि वह मानसिक रूप से तरोताजा रहे। रबिनारायण के लिए खेल से बड़ा अनुशासन और मानसिक मजबूती है। यहाँ तक कि जनवरी में होने वाली 10वीं की बोर्ड परीक्षा के लिए भी उन्होंने तन्वी पर कोई दबाव नहीं बनाया है।

जीत का जश्न नहीं, भविष्य की तैयारी सिल्वर मेडल जीतने के बाद तन्वी ने जिस तरह से 6 मैच प्वाइंट बचाकर वापसी की, उसकी तारीफ हर जगह हो रही है। लेकिन उनके पिता इसे किसी बड़े जश्न की तरह नहीं देखते। उनका मानना है कि अगर वह अभी से जश्न मनाने लगेगी, तो भविष्य के बड़े ओलंपिक मेडल के लिए क्या बचाएगी?

अनुशासन का कड़ा सबक पिता रबिनारायण ने तन्वी को कोर्ट पर स्टोइक रहना सिखाया है। वे कहते हैं, मैंने उसे सिखाया है कि अंक जीतने पर चिल्लाने या जश्न मनाने की जरूरत नहीं है, न ही विपक्षी का अपमान करना है। अगर तुम हारते हो, तो ये चीजें निराशा बढ़ाती हैं। बस अनदेखा करना सीखो और अपने खेल पर ध्यान दो।

तन्वी के पिता का स्पष्ट मानना है कि एथलीटों को बेहतर सुविधाएं और ट्रांजिट के लिए बेहतर प्लानिंग की जरूरत है। फिलहाल, तन्वी की सफलता उनके पिता की दूरगामी सोच और उनकी अपनी अटूट मेहनत का परिणाम है, जो बताती है कि असली चैंपियन हालातों को नहीं, बल्कि खुद को बदलते हैं।

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