कांग्रेस की रॉयल दिवाली : मिठाइयों के बीच बिछी सियासत की बिसात, राहुल के घर जुटे दिग्गज
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दिवाली का त्यौहार खुशियां बांटने का अवसर होता है, लेकिन 6 नवंबर को राहुल गांधी के सरकारी आवास पर हुई दिवाली मिलन पार्टी ने इसे सियासी चर्चाओं का केंद्र बना दिया। कांग्रेस आलाकमान ने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर CWC सदस्यों, वरिष्ठ पदाधिकारियों और राज्य प्रभारियों को एक मंच पर बुलाया है। इसे आधिकारिक तौर पर सामाजिक आयोजन बताया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे की हलचल कुछ और ही कहानी कह रही है।

मिठाइयों की टेबल पर चुनावी रणनीति राहुल गांधी के घर आयोजित इस कार्यक्रम में केवल बधाई संदेशों का आदान-प्रदान नहीं हुआ। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, इस दौरान भविष्य की कार्ययोजनाओं और केंद्र सरकार के खिलाफ जारी आंदोलनों पर भी गहन मंथन हुआ। हरीश रावत ने स्वीकार किया कि नेताओं के बीच आने वाले समय की रणनीति को लेकर सुखद और सकारात्मक चर्चा हुई है।

सरकार पर संविधान बचाने का दबाव यह मिलन समारोह ऐसे समय हुआ है जब कांग्रेस और इंडी गठबंधन आक्रामक मोड में है। हाल ही में 1 नवंबर की बड़ी रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मोर्चा खोलकर कांग्रेस ने सरकार को घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इसे राहुल गांधी का निजी नहीं, बल्कि देश का अभियान बताया है। उन्होंने कहा कि विपक्ष का नेता होने के नाते राहुल गांधी का कर्तव्य संविधान और लोकतंत्र की रक्षा करना है।

सचिन पायलट और अन्य नेताओं के कड़े तेवर दिवाली की खुशियों के बीच भी सरकार की तीखी आलोचना जारी रही। सचिन पायलट ने चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों को गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने आजीवन छूट (इम्यूनिटी) के मुद्दे पर सरकार को घेरा और कड़े सवाल किए। वहीं, भूपेश बघेल ने 1 नवंबर की रैली को अभूतपूर्व बताते हुए जनता के समर्थन को कांग्रेस की जीत बताया।

क्या है कांग्रेस का संदेश? हालांकि पार्टी के नेता इसे महज एक त्योहार का मिलन बता रहे हैं, लेकिन कुमारी शैलजा और जीतू पटवारी जैसे नेताओं की उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह एकजुट है। मिठाइयों के बहाने बुलाई गई इस दिवाली महफिल के जरिए राहुल गांधी ने साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष का रुख और अधिक कड़ा रहने वाला है।

यह आयोजन केवल एक रस्म अदायगी नहीं, बल्कि कांग्रेस की उस मिशन मोड रणनीति का हिस्सा है, जिसके केंद्र में वोट चोरी का मुद्दा और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सवाल है।

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