युद्ध में शरीर छलनी, फिर भी नहीं मानी हार: ऐसे बने मुरलीकांत पेटकर भारत के पहले पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट
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खेल की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो महज खिलाड़ी नहीं, बल्कि हौसले की मिसाल बन जाते हैं। भारतीय सेना के पूर्व जवान मुरलीकांत पेटकर का नाम इसी फेहरिस्त में सबसे ऊपर आता है। उन्होंने जो हासिल किया, वह सिर्फ एक गोल्ड मेडल नहीं था, बल्कि नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाने का जज्बा था।

बचपन से ही खेलों का जुनून 1 नवंबर 1944 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मे मुरलीकांत का मन बचपन से ही खेलों में रमता था। इसी जुनून ने उन्हें भारतीय सेना की वर्दी पहनने के लिए प्रेरित किया। सेना में आने के बाद उन्होंने बॉक्सिंग में अपनी पहचान बनाई और 1964 में इंटरनेशनल सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट में देश का प्रतिनिधित्व किया।

हवाई हमला और जिंदगी का सबसे कठिन मोड़ साल 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध ने मुरलीकांत की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। एक भीषण हवाई हमले में उन्हें नौ गोलियां लगीं और उनके ऊपर से एक टैंक गुजर गया। वे मौत के मुंह से तो बाहर आ गए, लेकिन रीढ़ की हड्डी में गोली फंसने के कारण उनके पैर हमेशा के लिए बेजान हो गए।

बॉक्सिंग छूटी, पर हौसला नहीं चलने-फिरने की क्षमता खोने के बाद किसी भी एथलीट के लिए खेल छोड़ देना स्वाभाविक था, लेकिन पेटकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने बॉक्सिंग को अलविदा कहकर तैराकी को अपना नया लक्ष्य बनाया। बिना पैरों के तैराकी में महारत हासिल करना एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम था, लेकिन मुरलीकांत की मेहनत रंग लाई और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमा दी।

1972 के पैरालंपिक्स में रचा इतिहास मुरलीकांत पेटकर के करियर का सबसे सुनहरा पल 1972 के हीडलबर्ग (जर्मनी) पैरालंपिक खेलों में आया। उन्होंने 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। वे पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले स्वतंत्र भारत के पहले खिलाड़ी बने। आज भी उनकी यह जीत भारतीय खेलों के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज है।

राष्ट्र ने माना लोहा मुरलीकांत के इस असाधारण सफर को देश ने उचित सम्मान दिया। साल 2018 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया, वहीं 2025 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। हाल ही में ईएमई (EME) कोर के 82वें स्थापना दिवस पर दक्षिणी कमान के सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ ने उन्हें सम्मानित कर उनके साहस को नमन किया।

मुरलीकांत पेटकर की कहानी हमें सिखाती है कि शरीर की चोटें इरादों को नहीं तोड़ सकतीं, बशर्ते इंसान अपने लक्ष्य पर अडिग रहे। उनका जीवन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों से लड़ रहा है।

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