ईरान में सेना प्रमुख, संसद में रक्षा मंत्री: मौलाना फजलुर रहमान के तंज से गूंजी नेशनल असेंबली
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पाकिस्तान की राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब वाकया चर्चा का केंद्र बना हुआ है। तेहरान में आयोजित एक क्षेत्रीय सुरक्षा बैठक में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की मौजूदगी और वहां रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है।

मौलाना का तीखा कटाक्ष नेशनल असेंबली में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि जब ईरान में रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर उच्चस्तरीय बैठक चल रही थी, तब रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ संसद में बैठे थे।

‘कोई शर्म होती है, कोई हया होती है’ मौलाना फजलुर रहमान ने ख्वाजा आसिफ को उन्हीं के अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, रक्षा मंत्री यहां बैठे हैं, विदेश मंत्री यहां बैठे हैं। क्या वहां भी गृह मंत्रालय की ड्यूटी होती है? अपना सम्मान और कद देखिए, कोई शर्म होती है, कोई हया होती है।

मौलाना का यह बयान इसलिए भी वायरल हुआ क्योंकि ख्वाजा आसिफ पहले विपक्ष (PTI) पर निशाना साधने के लिए इसी शब्दावली का इस्तेमाल कर चुके हैं। मौलाना के इस तंज पर संसद में हंसी के ठहाके गूंज उठे और सांसदों ने मेज थपथपाकर अपनी प्रतिक्रिया दी।

गृह मंत्री की मौजूदगी पर भी सवाल मौलाना ने तेहरान बैठक में गृह मंत्री मोहसिन नकवी की उपस्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि रक्षा से जुड़ी बैठक में गृह मंत्री की क्या आवश्यकता थी? तेहरान की इस अहम बैठक में पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ-साथ सऊदी अरब, तुर्किये और ईरान के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए थे, जिसमें क्षेत्रीय शांति पर चर्चा की गई।

ख्वाजा आसिफ ने दी सफाई विवाद बढ़ता देख रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अगले दिन संसद में स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि तेहरान में कोई नया रक्षा समझौता नहीं हो रहा था और न ही वह बैठक उनके मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में थी। उन्होंने तर्क दिया कि जनरल आसिम मुनीर वहां क्षेत्रीय शांति और संवाद को आगे बढ़ाने के लिए मौजूद थे।

नागरिक सरकार बनाम सैन्य नेतृत्व यह पूरा घटनाक्रम पाकिस्तान में नागरिक सरकार और सैन्य नेतृत्व के बीच शक्ति संतुलन को लेकर चल रही बहस को फिर से हवा दे गया है। जहां विपक्ष इसे रक्षा मंत्री की कार्यक्षमता और सरकार की लचर नीति के रूप में देख रहा है, वहीं सरकार इसे कूटनीतिक सामान्य प्रक्रिया बताकर अपना बचाव कर रही है।

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