जेडीयू खत्म हो चुकी है : मोकामा विधायक अनंत सिंह का बड़ा ऐलान, नई पार्टी बनाने की दी चेतावनी
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बिहार की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) से निष्कासित किए जाने के बाद मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने साफ़ कर दिया है कि उन्हें पार्टी से निकाले जाने का कोई मलाल नहीं है और अब वह अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी बनाएंगे।

नीतीश कुमार के बिना पार्टी में क्या बचा? पटना में मीडिया से मुखातिब होते हुए अनंत सिंह ने जेडीयू के मौजूदा नेतृत्व पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा, जेडीयू पूरी तरह खत्म हो चुकी है। यह पार्टी नीतीश कुमार की थी, लेकिन अब जब वे सक्रिय भूमिका में नहीं हैं, तो इस पार्टी में बचा ही क्या है? उन्होंने उन नेताओं के योगदान पर भी सवाल उठाए जिन्होंने उनके निष्कासन में भूमिका निभाई है।

चुनाव में दहाई का आंकड़ा भी मुश्किल अनंत सिंह ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने भविष्यवाणी की कि मौजूदा हालातों में जेडीयू को 10 सीटें भी हासिल नहीं होंगी। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने के बजाय अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करने को प्राथमिकता देंगे।

गहरी खींचतान और निष्कासन की वजह गौरतलब है कि जेडीयू ने हाल ही में अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ जाकर जनसुराज के प्रत्याशी का समर्थन किया था। इस कार्रवाई के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वे प्रशांत किशोर का हाथ थाम सकते हैं, लेकिन अनंत सिंह ने अपनी अलग राह चुनकर सबको चौंका दिया है।

नीतीश कुमार से व्यक्तिगत संबंध बरकरार राजनीतिक मतभेदों के बावजूद अनंत सिंह ने नीतीश कुमार के प्रति अपना रुख नरम रखा है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार से उनके व्यक्तिगत रिश्तों में कोई खटास नहीं है और वे भविष्य में भी उनसे मुलाकात कर सकते हैं। उन्होंने साफ किया कि उनका झगड़ा पार्टी की मौजूदा कार्यप्रणाली से है, न कि नीतीश कुमार से।

बदलते समीकरणों पर सबकी नजर अनंत सिंह के इस नए ऐलान ने बिहार की राजनीति में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। मोकामा क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले अनंत सिंह का अपना राजनीतिक दल बनाना आगामी चुनावों में जेडीयू और अन्य प्रमुख दलों के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि उनकी नई पार्टी का स्वरूप क्या होता है और यह बिहार के चुनावी नतीजों को कितना प्रभावित करती है।

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