सुलगते यूरोप: फ्रांस और स्पेन में भड़की हिंसा, दुकानों में लूटपाट और सड़कों पर कोहराम
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फ्रांस और स्पेन में एक बार फिर हिंसक दंगों ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। शनिवार (24 अक्टूबर 2026) को फ्रांस में महंगाई और स्कूल फंडिंग के मुद्दे पर शुरू हुआ प्रदर्शन हिंसक हो गया, जबकि स्पेन के बार्सिलोना में भी उपद्रवियों ने कोहराम मचा दिया है।

फ्रांस: मैक्रों के लिए सिरदर्द बने 4 लाख प्रदर्शनकारी

फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के खिलाफ नाराजगी चरम पर है। शनिवार को पेरिस समेत देश के कई शहरों में करीब 4 लाख लोग सड़कों पर उतरे। हालांकि शुरुआत शांतिपूर्ण थी, लेकिन पोर्ट डे विन्सेनेस पहुंचते ही प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी।

जवाब में पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और वॉटर कैनन्स का इस्तेमाल किया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पूरे देश में 70,000 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी।

गिरफ्तारियों का दौर और सुरक्षा चुनौतियां

पेरिस पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ऑफिस के अनुसार, हिंसा में शामिल होने के आरोप में 64 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें 6 नाबालिग भी शामिल हैं। ज्यादातर गिरफ्तारियां हथियारों रखने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में हुई हैं। गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने स्वीकार किया कि पिछले हफ्ते हुए दंगों में 3,000 से ज्यादा दुकानों को निशाना बनाया गया था, जिससे स्थिति संभलना मुश्किल हो गया है।

स्पेन के बार्सिलोना में आगजनी और लूटपाट

फ्रांस की तरह स्पेन का बार्सिलोना शहर भी हिंसा की चपेट में है। प्रदर्शनकारियों ने प्लाजा डी कैटालुन्या के पास कई दुकानों में लूटपाट की और 30 से अधिक स्थानों पर आगजनी की। इस अराजकता के कारण पर्यटकों में भारी दहशत है। स्पेनिश पुलिस ने तोड़फोड़ और हिंसा के आरोप में 100 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है।

राजनीतिक संकट और भविष्य की अनिश्चितता

फ्रांस में अगले साल मई 2026 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। ऐसे में यह अशांति मैक्रों सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। विपक्षी दल नेशनल रैली ने सरकार पर जनता की सुरक्षा में विफल रहने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, ट्रेड यूनियनों के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन ने राष्ट्रपति मैक्रों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

यूरोप के इन दो प्रमुख देशों में व्याप्त यह अशांति अरब स्प्रिंग जैसी आहट दे रही है, जिससे पूरे महाद्वीप में चिंता का माहौल है। प्रश्न यह है कि क्या सरकारें इस बढ़ते जन-आक्रोश को समय रहते थाम पाएंगी?

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