छत्तीसगढ़ के जंगलों में पोषण की कठिन राह: कागजी योजनाओं और असल जिंदगी के बीच दम तोड़ता बचपन
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छत्तीसगढ़ के सुदूर जंगल और पहाड़ी इलाकों में बचपन एक ऐसी अदृश्य जंग लड़ रहा है, जिसमें दुश्मन केवल बीमारी नहीं, बल्कि भौगोलिक बाधाएं और अभाव हैं। रायगढ़ जिले का धरमजयगढ़ ब्लॉक इस संकट का केंद्र बना हुआ है, जहां बरघाट, ऊपर सलखेता और चूहीपहाड़ जैसे गांवों के बच्चों के लिए सरकारी मदद अब भी कोसों दूर है।

भूख से कहीं अधिक गहरा है कुपोषण का संकट कुपोषण को अक्सर केवल भोजन की कमी समझा जाता है, लेकिन हकीकत में यह गरीबी, साफ पानी के अभाव और मां के कमजोर स्वास्थ्य का मिला-जुला परिणाम है। धरमजयगढ़ के दुर्गम इलाकों में स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब गंभीर रूप से बीमार बच्चे को मुख्य सड़क तक लाने के लिए भी घंटों का पैदल सफर तय करना पड़ता है। परिवहन की कमी के कारण इलाज में होती देरी कई बार जानलेवा साबित होती है।

एनआरसी (NRC): उपचार के बाद का जीवन कैसे सुरक्षित हो? प्रशासन द्वारा संचालित पोषण पुनर्वास केंद्रों (NRC) में बच्चों को 15-20 दिनों तक रखकर पौष्टिक आहार और चिकित्सकीय देखरेख दी जाती है। हालांकि, सवाल यह है कि बच्चा अस्पताल से डिस्चार्ज होकर जब वापस उसी अभावग्रस्त परिवेश में लौटता है, तो उसके दोबारा कुपोषित होने का खतरा कितना बना रहता है? विशेषज्ञ मानते हैं कि इलाज के बाद परिवार को सही मार्गदर्शन और घर पर पोषण की निरंतरता सुनिश्चित करना ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।

मां का स्वास्थ्य ही बच्चे की बुनियाद डॉक्टरों का मानना है कि गर्भधारण के दौरान मां का कुपोषण ही बच्चे की भविष्य की सेहत तय करता है। सुदूर अंचलों में स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच न होने से गर्भवती महिलाएं नियमित जांच से वंचित रह जाती हैं। यह चक्र तब तक नहीं टूटेगा जब तक स्वास्थ्य विभाग और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता केवल आंकड़ों के बजाय गर्भवती माताओं की नियमित ट्रैकिंग और काउंसलिंग पर जोर न दें।

480 बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य, क्या जमीनी हकीकत बदलेगी? प्रशासन ने धरमजयगढ़ और कापू के केंद्रों में इस साल 480 बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य रखा है। मितानिनों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का नेटवर्क इस दिशा में जुट तो रहा है, लेकिन चुनौती लक्ष्य पर ‘टिक’ लगाने की नहीं, बल्कि उन बच्चों की निरंतर निगरानी करने की है जो दुर्गम रास्तों के कारण मुख्यधारा की सेवा से कट चुके हैं।

जिम्मेदारी केवल आंकड़ों की नहीं, अंत्योदय की है कुपोषण के खिलाफ यह जंग मोबाइल हेल्थ यूनिट्स, विशेष स्वास्थ्य शिविरों और दुर्गम गांवों तक परिवहन की सुगम व्यवस्था के बिना नहीं जीती जा सकती। जब तक एक बीमार बच्चे को अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकारी तंत्र अपने कंधों पर नहीं लेता, तब तक कागजी योजनाएं और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग केवल चर्चा का विषय बनी रहेगी। असली जीत तब होगी, जब अंतिम छोर पर बैठे बच्चे को पोषण और इलाज उसकी दहलीज पर मिले।

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