पंजाब विधानसभा में घमासान: सुखपाल खैरा पूरे सत्र के लिए निलंबित, CM की गैरमौजूदगी पर विपक्ष का हमला
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चंडीगढ़: पंजाब विधानसभा का मौजूदा सत्र एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ गया। सदन के भीतर हुई तीखी नोकझोंक के बाद कांग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया है। इस कार्रवाई ने राज्य की राजनीति में सरकार और विपक्ष के बीच की दूरी और बढ़ा दी है।

सदन में क्यों हुई यह कार्रवाई? हंगामे के बीच पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने सुखपाल सिंह खैरा के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया। सरकार का आरोप है कि खैरा ने सदन में न केवल आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, बल्कि विधानसभा की कार्यवाही को भी जानबूझकर बाधित किया। इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद खैरा को सत्र की शेष अवधि के लिए सदन से बाहर कर दिया गया।

नशे का मुद्दा और विपक्ष का आक्रोश कांग्रेस ने राज्य में नशे के बढ़ते प्रकोप को लेकर सरकार को घेरा है। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष और विधायक परगट सिंह ने आरोप लगाया कि पार्टी एक निंदा पत्र मुख्यमंत्री भगवंत मान को सौंपना चाहती थी, लेकिन स्पीकर ने इसकी अनुमति नहीं दी। परगट सिंह ने वर्तमान सत्ता पक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि वे शहीद भगत सिंह के नाम का सहारा तो लेते हैं, लेकिन पंजाब के असल मुद्दों पर चुप हैं।

मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति पर उठे सवाल विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की सदन में लगातार दूसरे दिन की गैरमौजूदगी पर कड़े सवाल उठाए। बाजवा ने परविंदर सिंह झोटा के निधन का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि राज्य में नशे से हो रही मौतों के लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की सरकार जिम्मेदार है।

विपक्ष ने किया सदन से किनारा बाजवा ने स्पष्ट किया कि जब मुख्यमंत्री सदन में नहीं हैं, पार्टी अध्यक्ष का अता-पता नहीं है और स्पीकर विपक्ष की बात सुनने को तैयार नहीं हैं, तो सदन में बैठने का कोई औचित्य नहीं है। अपनी अनदेखी के विरोध में पूरी कांग्रेस ने सदन से बहिर्गमन किया।

राजनीतिक टकराव बढ़ने के आसार सुखपाल खैरा के निलंबन और विपक्ष के वॉकआउट ने पंजाब की सियासत में हलचल तेज कर दी है। एक तरफ सरकार इसे अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त कार्रवाई बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे लोकतांत्रिक आवाज को दबाने की कोशिश करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की सड़कों पर भी जोर पकड़ सकता है।

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