रायपुर। छत्तीसगढ़ की पहचान केवल प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित नहीं है। यहाँ की समृद्ध जनजातीय विविधता और सदियों पुरानी परंपराएं इसे दुनिया में अलग बनाती हैं। इन परंपराओं का सबसे बड़ा केंद्र है ‘बस्तर दशहरा’। यह कोई सामान्य त्यौहार नहीं, बल्कि 75 दिनों तक चलने वाला एक महापर्व है जो माँ दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था और जनजातीय संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है।
देशभर में दशहरे का अर्थ रावण दहन से जोड़ा जाता है, लेकिन बस्तर की परंपरा बिल्कुल अलग है। यहाँ रावण दहन की रस्म नहीं होती। इसके बजाय, यह पर्व स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना और धार्मिक अनुष्ठानों पर केंद्रित है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार इस अनूठी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और इसे वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में निरंतर काम कर रही है।
बस्तर दशहरा का संबंध ऐतिहासिक राजपरिवार और माँ दंतेश्वरी की आराधना से है। मान्यता है कि राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में इसे व्यापक स्वरूप मिला। आज यह पर्व केवल राजपरिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे बस्तर अंचल के जनजातीय समुदायों, ग्रामीणों और पारंपरिक पदाधिकारियों का सामूहिक उत्सव है। यह एक ऐसी विरासत है जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी बड़ी श्रद्धा से सहेजा गया है।
इस उत्सव की शुरुआत हरेली अमावस्या पर पाट जात्रा से होती है, जिसमें रथ निर्माण के औजारों की पूजा की जाती है। इसके बाद कई महत्वपूर्ण रस्में निभाई जाती हैं:
इस वर्ष बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित सहभागिता को लेकर प्रशासन पूरी तरह सक्रिय है। 23 अक्टूबर को होने वाले इस आयोजन के लिए बस्तर में सुरक्षा, यातायात और सांस्कृतिक प्रदर्शनी की व्यापक तैयारियां की गई हैं। अधिकारियों ने माँ दंतेश्वरी मंदिर और लालबाग मैदान का निरीक्षण कर सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया है।
बस्तर दशहरा केवल आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति देता है। डोकरा शिल्प, टेराकोटा और काष्ठ कला जैसे हस्तशिल्प को इस दौरान बड़े मंच मिलते हैं। जगदलपुर में विकसित बस्तर दशहरा पसरा जैसी सुविधाएं स्थानीय कारीगरों को पर्यटकों से जोड़ती हैं। सरकार का मानना है कि संस्कृति का सम्मान और पर्यटन का विस्तार बस्तर के विकास की मजबूत आधारशिला है।
एक दौर था जब बस्तर की चर्चा अक्सर नक्सलवाद के कारण होती थी, लेकिन आज यह अपनी प्राचीन संस्कृति के गौरव से पहचाना जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार विकास के साथ-साथ जनजातीय अस्मिता को संरक्षित कर रही है। बस्तर दशहरा इस बात का प्रमाण है कि विकास की मुख्यधारा में शामिल होकर भी कोई समाज अपनी जड़ों से कैसे जुड़ा रह सकता है। यह उत्सव आने वाली पीढ़ियों को उनकी गौरवशाली संस्कृति से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।
*बंदूक की गूंज से संस्कृति के उत्सव तक… बदलते बस्तर की नई कहानी!
— BJP Chhattisgarh (@BJP4CGState) October 18, 2026
एक दौर था, जब बस्तर की पहचान नक्सलवाद और हिंसा की चुनौतियों से जोड़कर देखी जाती थी। लेकिन बस्तर की असली पहचान उसकी समृद्ध संस्कृति, सदियों पुरानी परंपराओं और अटूट आस्था में बसती है।
आज डबल इंजन सरकार के प्रयासों… pic.twitter.com/TmGNKjv94u
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