एहतियातन हिरासत (Preventive Arrest): कानून या ज्यादती? जानिए क्यों गरमाया है सौरव दास और उनके साथियों की गिरफ्तारी का मामला
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क्या है एहतियातन हिरासत (Preventive Arrest)?

एहतियातन हिरासत का मुख्य उद्देश्य किसी संभावित अपराध या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को रोकना है। सरल शब्दों में, जब पुलिस को यह अंदेशा होता है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियों से शांति भंग हो सकती है, तो वह उसे हिरासत में ले सकती है। हालांकि, यह गिरफ्तारी नहीं, बल्कि एक सुरक्षात्मक उपाय है, जिसके लिए कानून में सख्त शर्तें तय की गई हैं।

पुलिस को कहां से मिलती है शक्ति?

इसके लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 170 का उपयोग किया जाता है। यह धारा पुलिस को किसी गंभीर अपराध की योजना को रोकने के लिए एहतियातन हिरासत में लेने की शक्ति देती है। कानून के अनुसार, इसके तहत किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई न हो।

रत्ना सिंह ने क्यों उठाए सवाल?

CJP की लीगल टीम की प्रमुख रत्ना सिंह ने सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे की हिरासत को पूरी तरह अवैध करार दिया है। उनका तर्क है कि जिन धाराओं के तहत इन्हें हिरासत में लिया गया है, वे इस मामले में लागू ही नहीं होतीं क्योंकि वहां कोई अपराध हुआ ही नहीं।

रत्ना सिंह का मुख्य सवाल यह है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से तिरंगा फहराने वाले लोगों को हिरासत में क्यों लिया गया? 13 अक्टूबर को ये कार्यकर्ता जंतर-मंतर परिसर में पहुंचे थे, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई की।

कानूनी प्रक्रिया में गंभीर खामियों का आरोप

रत्ना सिंह ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को न केवल देर रात तक उनके वकीलों से मिलने से रोका गया, बल्कि शुरुआत में उन्हें हिरासत में लेने का ठोस आधार भी नहीं बताया गया।

उधर, दिल्ली पुलिस का अपना पक्ष है। पुलिस का कहना है कि तीनों को एहतियातन (Preventive) हिरासत में लिया गया है ताकि भविष्य में किसी संभावित विवाद को टाला जा सके।

क्या हिरासत सजा है?

स्पष्ट रूप से कहें तो एहतियातन हिरासत कोई सजा नहीं है। इसे किसी अपराध के लिए दोषी करार देना नहीं माना जा सकता। यदि संबंधित व्यक्ति पर किसी विशिष्ट अपराध का मामला दर्ज है, तो उसकी कानूनी प्रक्रिया अलग से चलती है। लेकिन, जब हिरासत के दौरान बुनियादी मानवाधिकारों या कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न हो, तो यह संवैधानिक अधिकारों के हनन का मुद्दा बन जाता है।

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