चुनाव आयोग पर विपक्ष का जोरदार हमला: सुप्रीम कोर्ट पहुंची फाइलों और एजेंडे की जंग
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भारतीय निर्वाचन आयोग (EC) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सोमवार को राहुल गांधी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव सहित कई प्रमुख विपक्षी नेताओं ने एक मार्च निकाला और अदालत में याचिका दाखिल की। विवाद का मुख्य केंद्र चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया है।

क्या है विपक्षी दलों का आरोप? विपक्ष का मुख्य आरोप पारदर्शिता के अभाव को लेकर है। अपनी याचिका में नेताओं ने स्पष्ट किया है कि आयोग ने SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसले किस आधार पर लिए, यह अब तक रहस्य बना हुआ है। अब विपक्ष ने आयोग की पूरी फाइलों, मीटिंग के एजेंडे, कार्यवाही के विवरण और अधिकारियों की टिप्पणियों को सार्वजनिक करने की मांग की है।

डिजिटल रिकॉर्ड्स की जांच की मांग सिर्फ फाइलों तक ही मामला सीमित नहीं है। विपक्षी नेताओं ने ECINET और ERONET प्रणालियों के एक्सेस लॉग्स भी मांगे हैं। इनका तर्क है कि यदि मतदाता सूची में डिजिटल स्तर पर कोई छेड़छाड़ हुई है, तो उसे इन लॉग्स के जरिए ही पकड़ा जा सकता है। विपक्ष का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में किसी भी तरह की धांधली न हो।

कानूनी मानकों पर सवाल याचिका में सीधे तौर पर पूछा गया है कि क्या चुनाव आयोग के ये हालिया फैसले संविधान के अनुच्छेद 324 और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के नए कानूनों के अनुरूप हैं? साथ ही, विपक्ष ने टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्देशों का हवाला देते हुए आयोग की कार्यप्रणाली की न्यायिक जांच की मांग की है।

मतदाता सुरक्षा और अंतरिम रोक विपक्ष ने अपनी मांगों में तीन प्रमुख बिंदु रखे हैं:

  1. किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस दिया जाए और सुनवाई का मौका मिले।
  2. हटाए गए नामों की बूथ-वार सूची और उसके कारण सार्वजनिक किए जाएं।
  3. जब तक इस पूरे मामले की जांच किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता वाली कमेटी न कर ले, तब तक चल रही SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई जाए।

आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख तय करेगा कि चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और उसकी स्वायत्तता पर उठ रहे इन सवालों का क्या समाधान निकलता है।

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