राहुल गांधी के गठबंधन का अजीब खेल : एक तरफ सपा को कोस रहे नेता, दूसरी तरफ दफ्तर में हुई जूतम-पैजार
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उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी भारी अंतर्कलह और विरोधाभासी बयानों में उलझती नजर आ रही है। एक ओर राहुल गांधी दिल्ली में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर यूपी में उनकी पार्टी के नेता गठबंधन धर्म निभाने के बजाय सहयोगियों और अपनों पर ही निशाना साध रहे हैं।

गठबंधन या तकरार? सपा को औकात दिखाने की होड़

यूपी कांग्रेस के दिग्गज नेता पिछले कई महीनों से लगातार समाजवादी पार्टी (सपा) पर हमलावर हैं। सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद हों या पार्टी के अन्य बड़े चेहरे, हर कोई सार्वजनिक मंच से सपा के सामने सीटों के बटवारे को लेकर अपनी हैसियत जताता दिख रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन नेताओं ने सपा के समर्थन से जीत हासिल की या अपनी जमानत बचाई, वही आज गठबंधन को कमजोर करने वाले बयान दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह बयानबाजी कांग्रेस आलाकमान की मौन सहमति से हो रही है, या यूपी के नेता पार्टी लाइन से भटक चुके हैं?

लखनऊ दफ्तर बना अखाड़ा

11 अक्टूबर को लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय में जो हुआ, उसने पार्टी की आंतरिक स्थिति की पोल खोल दी। नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा मोना के स्वागत समारोह के दौरान पूर्व अध्यक्ष अजय राय के समर्थकों और नए गुटों के बीच जमकर तू-तू मैं-मैं हुई।

यह विवाद देखते ही देखते हाथापाई में बदल गया। हद तो तब हो गई जब पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय एक महिला पदाधिकारी (ममता चौधरी) के लिए बेहद अपमानजनक और अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए सुने गए। इस दौरान वहां वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी और इमरान मसूद भी मौजूद थे, लेकिन वे स्थिति संभालने में नाकाम रहे।

महिलाओं के सम्मान के दावों पर सवाल

कांग्रेस पार्टी अक्सर महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाती है। लेकिन लखनऊ मुख्यालय में सरेआम हुई इस बदसलूकी ने पार्टी के उन दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अपशब्दों का प्रयोग करते देखना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर न तो अनुशासन बचा है और न ही गरिमा।

क्या बिखराव की ओर बढ़ रही है कांग्रेस?

एक तरफ सपा के साथ गठबंधन को लेकर असमंजस है और दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती गुटबाजी। चुनावी रण में उतरने से पहले ही कांग्रेस जिस तरह से आपस में जूतम-पैजार कर रही है, वह उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के बीच एक नकारात्मक संदेश दे रहा है।

राहुल गांधी के लिए चुनौती सिर्फ बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से भी बढ़ गई है। यदि पार्टी ने समय रहते अपनी आंतरिक कलह को नहीं रोका, तो यूपी के आगामी चुनाव में इसका सीधा नुकसान गठबंधन को उठाना पड़ सकता है।

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