साड़ी पहनकर दौड़ती विधवा कविता: रामगढ़ की सड़कों पर उम्मीदों का मैराथन !
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रामगढ़ जिले के सिदो-कान्हू मैदान की सुबह आजकल एक खास गूंज से भर जाती है। यहाँ पसीने से तरबतर सैकड़ों महिलाएं अपने सपनों को सच करने के लिए दौड़ रही हैं। इन्हीं के बीच 32 वर्षीय कविता कुमारी का चेहरा और उनका जज्बा हर किसी का ध्यान खींच रहा है।

साड़ी में दौड़ती संघर्ष की कहानी सोसो गांव की रहने वाली कविता एक विधवा हैं और दो बच्चों की मां हैं। उनके पास न महंगे स्पोर्ट्स शूज हैं, न ही ट्रैकसूट। लेकिन, अभाव उनके हौसले के आड़े नहीं आया। 8 किलोमीटर का सफर तय कर मैदान पहुँचने वाली कविता अपनी रोजमर्रा की साड़ी पहनकर ही दौड़ का अभ्यास करती हैं।

खुद को साबित करने का जुनून कविता पहले सिर्फ दूसरों को दौड़ते देखने मैदान आती थीं, लेकिन फिर उन्होंने खुद दौड़ने की ठानी। पहले जो दूरी वह 8 मिनट में तय करती थीं, आज वही दौड़ वह 7 मिनट में पूरी कर रही हैं। दौड़ते हुए उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिससे उन्हें एक नई पहचान मिली है, हालांकि वह अभी भी अपनी सादगी और मेहनत में डूबी हैं।

जिम्मेदारी का बोझ, सपनों की उड़ान पति के निधन के बाद कविता पर अपने बच्चों और बुजुर्ग सास-ससुर की पूरी जिम्मेदारी है। वह बताती हैं कि होमगार्ड की नौकरी उनके लिए महज एक रोजगार नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने का जरिया है। वह ईंट-भट्ठे पर काम करने से लेकर घर की चौखट तक, हर जिम्मेदारी निभाते हुए अपने लक्ष्य पर केंद्रित हैं।

मैदान पर ऐसी कई कविताएं सिदो-कान्हू मैदान में कविता जैसी कई अन्य महिलाएं भी हैं। सुनीता कुमारी जैसी अभ्यर्थी, जो गरीब किसान परिवार से हैं, वह भी साड़ी और चप्पल में दौड़ रही हैं। किसी के लिए यह परिवार का सहारा बनने का मौका है, तो किसी के लिए गरीबी की बेड़ियों को तोड़ने का आखिरी रास्ता। इन महिलाओं को फिटनेस कोच सिकंदर पांडेय और अन्य प्रशिक्षक मुफ्त में ट्रेनिंग दे रहे हैं।

284 पदों के लिए कड़ी परीक्षा रामगढ़ में होमगार्ड के 284 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया 24 अक्टूबर से शुरू होकर 5 नवंबर तक चलेगी। इस भर्ती में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित हैं, साथ ही विधवा और तलाकशुदा महिलाओं के लिए भी 5 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें सुरक्षित हैं। अब देखना यह है कि शारीरिक परीक्षण और दौड़ की इस अग्निपरीक्षा में कितनी महिलाओं के सपने नौकरी की वर्दी में बदलते हैं।

कविता और उनके जैसी अन्य महिलाओं का जज्बा यह साबित करता है कि संसाधनों की कमी हो सकती है, लेकिन बुलंद हौसलों के आगे हार निश्चित नहीं होती।

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