एशियन गेम्स विजेता: एक ही मेडल, अलग-अलग इनाम; क्यों बढ़ रही है राज्यों के बीच यह असमानता?
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एशियन गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों ने पदकों की रिकॉर्ड बौछार की है, लेकिन जीत के जश्न के बीच इनाम की राशि का मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। एक ही टीम में साथ खेलने वाले दो खिलाड़ियों को अलग-अलग राज्यों से मिलने वाली इनामी राशि में करोड़ों का अंतर है।

पदकों की जंग और राज्यों का बजट एशियन गेम्स 2026 में भारत ने कुल 85 पदक जीते। हरियाणा जैसे राज्यों ने पदकों की झड़ी लगाकर शीर्ष स्थान हासिल किया। केंद्र सरकार व्यक्तिगत गोल्ड पर 30 लाख, सिल्वर पर 20 लाख और ब्रॉन्ज पर 10 लाख रुपये देती है, लेकिन राज्यों द्वारा घोषित अतिरिक्त इनाम में भारी अंतर नजर आ रहा है।

इनाम की दौड़: किसका पलड़ा भारी? हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य गोल्ड मेडल पर 3 करोड़ रुपये तक दे रहे हैं, तो वहीं पश्चिम बंगाल ने इसे बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया है। दूसरी ओर, कई राज्य ऐसे भी हैं जिनका बजट सीमित है, जिससे वहां इनाम की राशि काफी कम है। पंजाब और महाराष्ट्र में गोल्ड के लिए 1 करोड़ रुपये दिए जाते हैं, जबकि तमिलनाडु और अन्य छोटे बजट वाले राज्य इससे कम इनाम दे रहे हैं।

कर्नाटक में क्यों मचा बवाल? विवाद तब गहराया जब कर्नाटक सरकार ने शुरुआत में गोल्ड के लिए महज 35 लाख रुपये का ऐलान किया। एथलीट एम.आर. पूवम्मा ने इस पर नाराजगी जताते हुए इसे नाकाफी बताया। दबाव के बाद सरकार को झुकना पड़ा और अब गोल्ड विजेता को 1 करोड़ रुपये देने का ऐलान किया गया है। साथ ही खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरियों में 2 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा भी की गई है।

असमानता पर उठे सवाल ओलंपिक पदक विजेता विजेंदर सिंह ने इस भेदभाव पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि एक ही टीम की दो खिलाड़ियों को अलग-अलग राशि मिलना गलत है। विजेंदर ने मांग की है कि पूरे देश में खिलाड़ियों के लिए समान इनामी राशि का कानून होना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय भेदभाव खत्म हो सके।

क्यों अलग-अलग हैं नियम? विशेषज्ञों के अनुसार, खेल राज्य सूची का विषय है। हर राज्य की अपनी खेल नीति और बजट प्राथमिकताएं होती हैं। जिन राज्यों में खेलों के लिए समर्पित बड़ा बजट और मजबूत प्रशासनिक ढांचा है, वहां इनाम अधिक हैं। वहीं, सीमित संसाधन वाले राज्य उतनी बड़ी राशि देने में असमर्थ रहते हैं।

यह असमानता न केवल खिलाड़ियों का मनोबल प्रभावित करती है, बल्कि इस बात पर भी बहस छेड़ती है कि क्या भारत को खेलों के लिए एक सेंट्रलाइज्ड रिवॉर्ड पॉलिसी की जरूरत है।

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