तानाशाही बनाम कानून: चुनाव आयोग पर बृजभूषण शरण सिंह के बयान के सियासी मायने
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अपने बेबाक बयानों के लिए मशहूर बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने एक बार फिर चुनाव आयोग और ईवीएम पर बहस छेड़ दी है। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा है कि 2023 से पहले चुनाव आयोग में नियुक्ति की कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं थी, जो अपने आप में एक तानाशाही जैसा दौर था।

तानाशाही पर क्या बोले बृजभूषण?

बृजभूषण ने दावा किया कि 2023 में संसद द्वारा कानून बनाए जाने से पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मनमानी तरीके से होती थी। उन्होंने इसे हिटलरशाही करार दिया। उनके अनुसार, संसद द्वारा पारित नया कानून ही वह संवैधानिक आधार है जो नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाता है। इसमें तीन सदस्यीय समिति में पीएम, नेता प्रतिपक्ष और एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।

विपक्ष पर करारा हमला

बृजभूषण ने सीधे तौर पर कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने नवीन चावला और एमएस गिल जैसे पूर्व चुनाव आयुक्तों का उदाहरण देते हुए पूछा कि उस समय नियुक्ति का आधार क्या था? उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से अपने राजनीतिक किले ढहते देख विपक्ष अब हार की हताशा में ईवीएम और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और बयान का समय

यह बयान ऐसे समय आया है जब 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई होनी है। इस बयान के तीन गहरे सियासी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं:

  1. कानून के पक्ष में माहौल बनाना: सरकार का पक्ष रखते हुए बृजभूषण यह संदेश दे रहे हैं कि मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया मनमानी नहीं, बल्कि एक वैध संसदीय कानून है।
  2. विपक्ष की हताशा को उजागर करना: वह अदालत में चल रही कानूनी लड़ाई को विपक्ष की राजनीतिक हताशा बता रहे हैं। उनका तर्क है कि सत्ता में रहते हुए जो व्यवस्था सही थी, वही अब हार के डर से गलत हो गई है।
  3. रक्षात्मक से आक्रामक रुख: ऐतिहासिक उदाहरणों (एमएस गिल का मंत्री बनना) को सामने लाकर बीजेपी यह जताना चाहती है कि पूर्व में नियुक्तियाँ अधिक विवादास्पद थीं।

निष्कर्ष: यह सिर्फ बयानबाजी नहीं, रणनीति है

बृजभूषण शरण सिंह का यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि आगामी अदालती सुनवाई से पहले बीजेपी की सोची-समझी रणनीति है। जहाँ विपक्ष अदालत के जरिए चुनाव आयोग के स्वरूप पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष संसदीय संप्रभुता और अतीत के उदाहरणों के जरिए आयोग की साख को बचाने की कोशिश कर रहा है।

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