स्वच्छता को लेकर देश में अक्सर सरकारी अभियानों और करोड़ों के बजट की चर्चा होती है, लेकिन असली बदलाव जमीन से कैसे आता है, इसका जीता-जागता उदाहरण ओडिशा का बबेइजोड़ा गांव है। मयूरभंज जिले का यह छोटा सा गांव आज देश के लिए स्वच्छता की एक मिसाल बन चुका है।
उद्योगपति हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया पर इस गांव का एक वीडियो साझा किया है, जिसमें यहां की साफ-सफाई और अद्भुत सामुदायिक भावना को देखकर हर कोई हैरान है।
करीब 15 साल पहले गांव के स्थानीय शिक्षक मधुसूदन मरांडी ने बबेइजोड़ा को एक मॉडल विलेज बनाने की ठानी थी। शुरुआत एक व्यक्ति के संकल्प से हुई, लेकिन धीरे-धीरे पूरा गांव इस मुहिम के साथ जुड़ गया। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से फंड इकट्ठा किया और डस्टबिन, सीसीटीवी कैमरे और सोलर लाइट्स जैसी सुविधाएं जुटाईं।
बबेइजोड़ा में स्वच्छता का अनुशासन काबिले तारीफ है। गांव की महिलाएं दिन में तीन बार सड़कों और गलियों की सफाई करती हैं। हर 30 मीटर पर डस्टबिन लगाए गए हैं, ताकि कचरा सड़क पर न फेंका जाए। इकट्ठा किए गए कचरे में से जैविक कचरे को अलग कर उसे खाद (कंपोस्ट) में बदल दिया जाता है।
इस गांव में प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित है। यही नहीं, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान, थूकने और गुटका खाने पर भी सख्त रोक है। गांव की सुरक्षा और निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, ताकि बाहरी पर्यटकों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा गंदगी फैलाने पर जुर्माना लगाया जा सके या उन्हें सफाई के लिए कहा जा सके।
बबेइजोड़ा की खूबसूरती सिर्फ यहां की साफ गलियां नहीं, बल्कि यहां की परंपराएं भी हैं। गांव में रहने वाले करीब 70 संथाल परिवारों ने अपने मिट्टी के घरों को पारंपरिक भीत पोटाव पेंटिंग से सजाया है। सबसे खास बात यह है कि इन पेंटिंग्स में पूरी तरह से प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जो मिट्टी, पत्थर, पेड़ों की छाल और फूलों से तैयार होते हैं।
बबेइजोड़ा की यह कहानी उन सभी के लिए एक तमाचा है जो हर काम के लिए सिर्फ सरकार और प्रशासन की ओर ताकते रहते हैं। इस गांव ने साबित कर दिया है कि स्वच्छता कोई थोपी हुई व्यवस्था नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत और सामुदायिक आदत है। यदि 70 परिवारों का एक छोटा सा गांव 15 सालों तक बिना रुके खुद को स्वच्छ रख सकता है, तो यह संकल्प पूरे देश में क्यों नहीं दोहराया जा सकता?
Babeijoda in Odisha has stayed clean, litter-free and plastic-free for last 15 years thanks to a strong community spirit.
— Harsh Goenka (@hvgoenka) October 3, 2026
Why not we take this as a mission in every village and every city? pic.twitter.com/tvZ4bDcp5L
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