प्रशांत महासागर की गर्मी ने बिगाड़ा दुनिया का मौसम, भारत पर दिखा गहरा असर
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प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि, जिसे अल नीनो (El Niño) कहा जाता है, इस साल दुनिया भर के मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल दिया है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का अत्यधिक गर्म होना केवल एक समुद्री घटना नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु के लिए एक बड़ा संकट बनकर उभरा है।

भारत में मानसून पर पड़ा भारी असर

भारत में इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर के बीच बारिश सामान्य से 12.6% कम रही। पूरे सीजन में 759.4 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत 868.6 मिमी होता है। साल 2001 के बाद यह देश का चौथा सबसे कम वर्षा वाला मानसून रहा, जिसका सीधा असर कृषि और जल संसाधनों पर पड़ा है।

अल नीनो कैसे बदलता है बारिश का गणित?

जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, तो वायुमंडलीय दबाव और हवाओं का रुख बदल जाता है। यह बदलाव दुनिया भर में बादलों के बनने और बारिश के वितरण को प्रभावित करता है। हालांकि, मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो की तीव्रता और किसी विशेष क्षेत्र पर उसके सटीक प्रभाव के बीच सीधा संबंध नहीं होता, फिर भी इसके पैटर्न ग्लोबल वार्मिंग के साथ जुड़कर अधिक अनिश्चित हो गए हैं।

क्षेत्रीय असमानता: कहीं सूखा, तो कहीं सामान्य बारिश

अल नीनो का प्रभाव पूरे भारत में एक समान नहीं रहा। जहां पंजाब, अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय जैसे राज्यों में लगातार बारिश की कमी देखी गई, वहीं देश के कुछ अन्य हिस्सों में बारिश सामान्य के करीब रही। यह क्षेत्रीय विभिन्नता साबित करती है कि मानसून केवल अल नीनो पर निर्भर नहीं होता, बल्कि स्थानीय मौसम प्रणालियां और समुद्री हवाएं भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।

अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया तक फैली चिंता

अल नीनो का असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में जहां सूखे जैसी स्थिति बनी, वहीं अमेरिका के कुछ हिस्सों में असामान्य बारिश देखी गई। 2026 के आंकड़े बताते हैं कि प्रशांत महासागर में हो रहे ये बदलाव दुनिया के दूरदराज के देशों के कृषि चक्र और तापमान को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।

आने वाले महीनों के लिए चेतावनी

अमेरिकी एजेंसी NOAA की रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है। उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों में इसके ‘बहुत मजबूत’ स्तर पर पहुंचने की संभावना 90% से अधिक है। समुद्री सतह के तापमान में 3°C से अधिक की असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस बात का संकेत है कि मानसून के बाद भी इसका असर सर्दियों के मौसम और तापमान में बड़े उलटफेर के रूप में देखने को मिल सकता है।

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