यूपी का ट्रिपल कार्ड : 40 साल पुराने फॉर्मूले से कांग्रेस का बड़ा दांव, क्या 2027 में बदलेगी तस्वीर?
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उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपनी बिसात बिछा दी है। पार्टी ने चार दशक पुराने ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम (BDM) सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को फिर से जिंदा किया है। संगठन में बड़े बदलाव कर कांग्रेस ने सत्ता का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया है।

आराधना मोना के जरिए डबल वार रामपुर खास से तीन बार की विधायक और वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा मोना को यूपी कांग्रेस की कमान सौंपी गई है। पार्टी की यह रणनीति दोतरफा है। पहला, ब्राह्मण वोट बैंक को वापस खींचना, जो 90 के दशक के बाद भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया था। दूसरा, लड़की हूं, लड़ सकती हूं अभियान को आगे बढ़ाते हुए महिला मतदाताओं को एक सशक्त नेतृत्व देना।

ब्राह्मण वोट: सत्ता का किंगमेकर यूपी में ब्राह्मण आबादी करीब 10 से 12 फीसदी है, लेकिन इनका प्रभाव 110-115 सीटों पर सीधा है। गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज और कानपुर जैसे जिलों में ये निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस की नजर योगी सरकार से नाराज चल रहे ब्राह्मण तबके पर है। पार्टी इस असंतोष को अपने पक्ष में भुनाना चाहती है।

इमरान मसूद और मुस्लिम वोट बैंक सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों पर अपनी पकड़ मजबूत की है। यूपी की राजनीति में 20 फीसदी मुस्लिम आबादी हमेशा से सत्ता की चाबी रही है। हालिया लोकसभा चुनाव में इस वर्ग का झुकाव कांग्रेस की ओर बढ़ा है, जिसे इमरान मसूद के जरिए पार्टी और पुख्ता करना चाहती है।

दलित और OBC पर नजर कांग्रेस ने दलित और पिछड़ा वर्ग (OBC) को साधने के लिए भी खास नियुक्तियां की हैं। आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने दलित वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की है। वहीं, देविंदर निषाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सहेजने का प्रयास किया गया है।

क्या है कांग्रेस का असली लक्ष्य? मायावती की बसपा के कमजोर होने से दलित वोट बैंक के सामने विकल्प की कमी है। वहीं, सपा के पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक में सेंधमारी कर कांग्रेस खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित करना चाहती है। अब देखना यह है कि यह पुराना फॉर्मूला 2027 के महासंग्राम में कांग्रेस के लिए कितनी सीटें जीत पाता है।

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